नोट छापने की मशीन है सिंदूर की खेती, खाने-पीने से पहनने तक, हर घर में होता है इस्तेमाल; 25 साल तक होती है कमाई
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/18/article/image/h-(1)-1771423789391_m.webpनोट छापने की मशीन है सिंदूर की खेती, खाने-पीने से पहनने तक, हर घर में होता है इस्तेमाल; 25 साल तक होती है कमाई
नई दिल्ली| सिंदूर की खेती किसानों के लिए कम लागत में लंबी कमाई का जरिया बनती जा रही है। जिस सिंदूर का इस्तेमाल महिलाएं मांग में करती हैं, वही पौधा आज फूड और टेक्सटाइल इंडस्ट्री में भी डिमांड में है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है- नेचुरल रेड और येलो कलर, जो बीज से निकाला जाता है।
अब सवाल यह है कि आखिर सिंदूर की खेती (sindoor ki kheti) होती कैसे है, इसमें कितनी लागत आती है और कितनी कमाई होती है? इसे लेकर जागरण बिजनेस ने छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के सीईओ जेएसीएस राव (JACS Rao) और छत्तीसगढ़ स्टीविया एंड हर्बल्स की प्रोपराइटर रीनू छाबड़ा से बात की। जिसमें उन्होंने हर एक कंफ्यूजन दूर किया।
सिंदूर की खेती कैसे होती है?
जेएसीएस राव बताते हैं कि सिंदूर के पौधे उसके बीज से तैयार किए जाते हैं।
[*]पहले नर्सरी में बीज बोए जाते हैं।
[*]करीब 1 से 1.5 महीने में पौधे तैयार हो जाते हैं।
[*]इसके बाद इन्हें छोटे पॉलीबैग में ट्रांसप्लांट किया जाता है।
[*]फिर खेत में 5×5 मीटर की दूरी पर रोपाई की जाती है।
[*]एक एकड़ में लगभग 500 पौधे लगाए जा सकते हैं।
कितने समय में तैयार होती है फसल?
[*]सिंदूर का पौधा तेजी से बढ़ता है और 14 महीने में पौधा पूरी तरह विकसित हो जाता है।
[*]दूसरे साल से बीज आना शुरू हो जाता है।
[*]तीसरे साल से अच्छी पैदावार मिलती है।
[*]एक बार लगाने के बाद 20-25 साल तक लगातार उत्पादन देता है।
एक एकड़ में लागत और कितनी कमाई?
अगर एक एकड़ में 500 पौधे लगाए जाएं और हर पौधे से कम से कम 1 किलो बीज मिले, तो कुल 500 किलो बीज तैयार होगा।
[*]बाजार भाव: करीब 300 प्रति किलो किलोग्राम
[*]कुल आय: 500×300 = ₹1,50,000 प्रति साल (औसत अनुमान)
रीनू छाबड़ा बताती हैं कि लागत में नर्सरी, पौध तैयार करना, गड्ढे खोदना, खाद और सिंचाई शामिल हैं। शुरुआती साल में खर्च थोड़ा ज्यादा होता है, लेकिन बाद में मेंटेनेंस कम रहता है। दूसरे साल से कमाई शुरू हो जाती है और लंबे समय तक स्थिर आय मिलती है।
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सिंदूर का इस्तेमाल कहां होता है?
[*]महिलाओं के सिंदूर में
[*]फूड इंडस्ट्री में नेचुरल कलरिंग एजेंट के रूप में
[*]चीज़, बटर और प्रोसेस्ड फूड में रंग देने के लिए
[*]टेक्सटाइल इंडस्ट्री में कपड़े रंगने में
[*]एक्सट्रैक्ट बनाकर एक्सपोर्ट
इसके बीज में \“बिक्सिन\“ नाम का प्राकृतिक रंग तत्व होता है, जिसकी मात्रा करीब 2.1% तक पाई गई है। यही इसे इंडस्ट्री में खास बनाता है।
कहां बेच सकते हैं?
[*]मसाला और रंग बनाने वाली कंपनियों को
[*]फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स
[*]टेक्सटाइल इंडस्ट्री
[*]एक्सट्रैक्शन यूनिट
[*]निर्यात (एक्सपोर्ट) मार्केट
जेएसीएस राव के मुताबिक, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इसकी अच्छी पैदावार देखी जा रही है। सिंदूर की खेती कम जोखिम, लंबी अवधि और नेचुरल डाई की बढ़ती मांग के चलते किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है।
छत्तीसगढ़ औषधीय पादप बोर्ड की अनूठी पहल
छत्तीसगढ़ औषधीय पादप बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने बताया कि छत्तीसगढ़ की महिला किसानों को लखपति दीदी बनाया जा रहा है। जिसके तहत अनूठी पहल की जा रही है। इसके तहतः
[*]राज्य के 28 से गांवों की आदिवासी महिलाएं 100 एकड़ जमीन पर औषधीय पौधों की खेती करवाई जा रही है।
[*]सीईओ सीएसीएस राव के निर्देशन में बोर्ड हर साल 2 करोड़ पौधे तैयार कर रहा है।
[*]प्रदेशभर में किसानों को मुफ्त पौधे, बीज, ट्रेनिंग और तकनीकी सहायता दी जा रही है।
[*]बुवाई से कटाई तक पूरी सरकारी मदद उपलब्ध कराई जा रही है।
[*]बायबैक स्कीम के तहत बोर्ड, एनजीओ और कंपनियां खुद फसल खरीदती हैं।
[*]बंजर जमीन को उपजाऊ बनाकर आदिवासी महिलाओं की आय बढ़ाई जा रही है।
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