cy520520 Publish time 2026-2-19 09:57:21

यूपी में केरल के Concer9 टूल्स से Autism की स्क्रीनिंग, 12-18 माह के बच्चों के लिए पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत

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नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में स्क्रीनिंग की शुरुआत की गई है। फोटो: आर्काइव



सुमित शिशोदिया, नोएडा। चाइल्ड पीजीआई के मेडिकल जेनेटिक विभाग ने केरल राज्य की तर्ज पर 12 से 18 महीने के नौनिहालों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) की पहचान के लिए विकासात्मक स्क्रीनिंग क्लीनिंग शुरू किया है। अभी इसे क्राॅस सेक्शनल पायलट अध्ययन प्रोजेक्ट के आधार पर शुरू किया गया है।

दावा है कि चाइल्ड पीजीआई में तैयार स्क्रीनिंग क्लीनिक उत्तर प्रदेश की अपने आप में पहली हैं। यहां उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, झारखंड समेत विभिन्न राज्यों के एएसडी ग्रस्त बाल मरीजों की निश्शुल्क स्क्रीनिंग के साथ परामर्श दिया जाएगा।

2002 में केरल के चाइल्ड डेवलपमेंट क्लीनिक में सीनियर साइंटिस्ट बाबू जॉर्ज ने 12 से 18 माह के बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर की स्क्रीनिंग पर शोध किया था, जाे जनरल में भी प्रकाशित हो चुका है।

उन्होंने शोध के दौरान Concern9 टूल्स के तहत नौ सवालों का प्रारूप तैयार किया, जिसे अब चाइल्ड पीजीआई में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों के बच्चों में पहचान के लिए भरवाया जा रहा है।

मेडिकल जेनेटिक विभाग के प्रमुख डाॅ. मयंक निलय ने स्वयं उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों के बच्चों पर शोध शुरू किया है। उन्होंने बताया कि 12 से 18 माह के जो भी मासूम बच्चे पीजीआई में टीकाकरण कराने आएंगे।

उनके अभिभावकों से Concern9 टूल्स का प्रारूप भरवाया जा रहा है। विशेष बात है कि इसमें बच्चे की सामान्य गतिविधियों पर आधारित प्रश्न हैं। इन जवाब के आधार पर नौनिहाल की बीमारी स्कैन की जाएगी। इस अध्ययन को संस्थागत नैतिक समिति से स्वीकृति मिल चुकी है।

डाॅ. मयंक के मुताबिक, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर न्यूरो-विकास संबंधी अवस्था है, जो जन्म के बाद ही मासूम के संचार, सामाजिक सहभागिता और व्यवहार को प्रभावित करती है। इसके शुरुआती लक्षण 12 माह की आयु से दिखाई दे सकते हैं लेकिन, अक्सर पहचान में देरी हो जाती है।

यह अध्ययन नियमित टीकाकरण के लिए आने वाले 12-18 माह आयु के बच्चों की Concern9 टूल से जांच करेगा। विशेषज्ञों का मानना है जागरूकता की कमी और समय पर पहचान न होने के कारण सैंकड़ों बच्चे जरूरी परामर्श से वंचित रह जाते हैं। समय पर स्क्रीनिंग और मूल्यांकन से जोखिम वाले बच्चों की पहचान कर डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर में शीघ्र हस्तक्षेप प्रारंभ किया जा सकता है।

संस्थान के निदेशक डाॅ. अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि Concern9 टीकाकरण केंद्र और मेडिकल जेनेटिक विभाग से अभिभावकों को उपलब्ध हो जाएगा। इसमें आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर पर चल रही शोध की जानकारी, उद्देश्य, प्रकिया, जोमिख और लाभ समेत अन्य महत्वपूर्ण अंशों पर अभिभावकों की सहमति ली जाएगी।
अब तक 20 बच्चों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है

विशेषज्ञ बताते हैं कि 20 बच्चों की स्क्रीनिंग के लिए अभिभावकों ने Concern9 टूल्स फार्म भरकर दिया। अच्छी बात है कि उनके जवाब के आधार पर बच्चे की स्क्रीनिंग की गई तो उसमें कोई भी ऑटिज्म का शिकार नहीं मिला है। यही नहीं, ऑटिज्म की पहचान कर उसके निदान के लिए डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर और मेडिकल जेनेटिक विभाग मिलकर काम करेंगे।

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