हाउसवाइफ से ‘पराली आर्ट क्वीन’ तक; जिसे खेतों में जला देते थे, उसे बंगाल की ज्योत्सना ने बनाया रोजगार का जरिया
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/19/article/image/18GUR_74_18022026_133-1771478886050-1771478938069_m.webpपराली से पहचान बनने वाली पश्चिम बंगाल के हुगली से आईं जोत्सना थंकरा कलाकृतियां के साथ। फोटो: संजय गुलाटी
वरुण त्रिवेदी, गुरुग्राम। पश्चिम बंगाल के जिला हुगली से आईं जोत्सना थंकरा आज पराली से खूबसूरत कलाकृतियां बनाकर न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही हैं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर भी बना रही हैं। धान कटाई के बाद खेतों में बची पराली, जिसे आमतौर पर नष्ट कर दिया जाता है, वही उनके लिए आज रोजगार और पहचान का जरिया बन चुकी है।
इस तरह का काम शुरू करने वाली वह बंगाल की पहली महिला हैं। उनके साथ वर्तमान में 15 से अधिक महिलाएं काम कर रही हैं। जो महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पातीं, उन्हें वह घर-घर जाकर काम उपलब्ध कराती हैं। इस पहल से कई गृहिणियों को आय का साधन मिला है।
साइबर सिटी के लेजरवैली ग्राउंड में चल रहे सरस आजीविका मेले में पश्चिम बंगाल पवेलियन में स्टाल में मौजूद जोत्सना बताती हैं कि पराली को सीधे उपयोग में नहीं लिया जा सकता। इसे तीन महीने तक विशेष प्रक्रिया से गुजारा जाता है। पानी और धूप जैसे प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत पराली को पहले पानी में कई दिनों भिगोकर रखा जाता है।
फिर सुखाने के बाद रंगाई करके धागे की तरह तैयार किया जाता है। इसके बाद बारीक काटकर डिजाइन शीट के अनुसार आकृतियां बनाई जाती हैं और अंत में फ्रेमिंग होती है। एक कलाकृति तैयार करने में 15 दिन से लेकर एक महीने तक का समय लग जाता है।
इस तरह का काम शुरू करने वाली वह वेस्ट बंगाल की पहली महिला हैं। उनके साथ वर्तमान में 15 से अधिक महिलाएं काम कर रही हैं। जो महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पातीं, उन्हें वह घर-घर जाकर काम उपलब्ध कराती हैं। इस पहल से कई गृहिणियों को आय का साधन मिला है।
सामान्य गृहिणी के तौर पर अपनी आधी जिंदगी बिता चुकीं जोत्सना बताती हैं कि दस वर्ष पहले तक वह किसी रोजगार से नहीं जुड़ी थीं, लेकिन स्वयं सहायता समूह के रूप में उनका यह प्रयास आज एक आंदोलन का रूप ले चुका है। अब ब्लाॅक और जिला स्तर पर उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए भी आमंत्रित किया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं इस कला से जुड़ सकें।
देश भर में पश्चिम बंगाल की बनीं पहचान
जोत्सना को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए वेस्ट बंगाल में राष्ट्रीय व जिला स्तर पर छह बार सम्मानित किया जा चुका है। वह विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में बीआईपी गिफ्ट के रूप में अपनी कलाकृतियां उपलब्ध कराती हैं। दिल्ली, हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों में प्रदर्शनी लगाकर वह वेस्ट बंगाल का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
शिल्प व संस्कृति से सजी पश्चिम बंगाल पवेलियन
पश्चिम बंगाल पवेलियन में हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पाद विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। यहां की बारीक हस्तकला की कांथा कढ़ाई वाली साड़ियां, तांत और बालूचरी वस्त्र, टेराकोटा की आकर्षक मूर्तियां और शोला शिल्प बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
जूट से बने बैग और सजावटी सामान पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ उपयोगिता और सौंदर्य का सुंदर मेल दिखाते हैं। मेले में लगे स्टाल पर इन सभी उत्पादों को आगंतुक खूब सराह रहे हैं।
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