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हिमाचल के ऐसे देवता जो लगाते हैं देव अदालत, फैसले को सहर्ष मानते हैं लोग; मंडी शिवरात्रि में पहुंचे तो भक्तों की जुटी भीड़

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मंडी शिवरात्रि में देवुलओं के साथ पहुंचे देव हुरंग नारायण। जागरण



जागरण संवाददाता, मंडी। हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी में शिवरात्रि महोत्सव चल रहा है, यहां देव महाकुंभ लगा हुआ है। 190 देवी-देवता यहां पहुंचे हैं। हम बात कर रहे हैं आराध्य देव देव हुरंग नारायण की। चौहार घाटी की बड़ी विशेषता यहां की देव अदालत है।

भूमि विवाद, पारिवारिक झगड़े या अन्य सामाजिक मामलों में लोग न्यायालय के बजाय देव दरबार में हाजिरी लगाते हैं। घाटी के वजीर देव पशाकोट की उपस्थिति में होने वाली सुनवाई में जो निर्णय आता है, उसे दोनों पक्ष सहर्ष स्वीकार करते हैं।

देवता गूर के माध्यम से फैसला सुनाते हैं। यहां के लोग देवता के प्रति गहरी आस्था रखते हैं व इनका मानना है कि देवता कभी अन्याय नहीं करते।
दिखता है अनुशासन का संगम

पद्धर उपमंडल की दुर्गम चौहार घाटी में आस्था, परंपरा और अनुशासन का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो आधुनिक न्याय व्यवस्था के समानांतर सशक्त सामाजिक ढांचा प्रस्तुत करता है। यहां के आराध्य देव देव हुरंग नारायण न केवल जनमानस की श्रद्धा के केंद्र हैं, बल्कि घाटी के सामाजिक और नैतिक विधान के सर्वोच्च संरक्षक भी माने जाते हैं।
हजारों वर्ष पुराना है इतिहास

देव हुरंग नारायण का इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। उनके रथ पर लगे सोने के मोहरे पर 100 ईस्वी अंकित होने की बात कही जाती है, जो उनकी प्राचीनता का संकेत देती है। लोकमान्यताओं के अनुसार हुरंग नारायण और घड़ोनी नारायण भगवान बलराम के प्रतिरूप हैं।
मंडी में रथ पहुंचते ही उमड़ पड़ते हैं श्रद्धालु

अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव के दौरान जब देव का रथ मंडी पहुंचता है, तो श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। नारला के समीप हिमरी गंगा से फूटी शीतल जलधारा को भी उनकी दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है। देव दरबार में अनुशासन सर्वोपरि है।
देवता धूमपान के सख्त विरोधी

हुरंग नारायण धूमपान के सख्त विरोधी माने जाते हैं। मान्यता है कि देव रथ के समीप धूमपान करने पर जुर्माना भरना पड़ता है, जबकि जानबूझकर नियम तोड़ने वालों को देव कोप का सामना करना पड़ सकता है।
मेमने की बलि पर भी लगाया प्रतिबंध

पुजारियों के अनुसार, बाल्यकाल की एक घटना के बाद से देवता ने धूमपान को वर्जित कर दिया। समय के साथ परंपराओं में भी परिवर्तन हुआ है और पूर्व में दी जाने वाली मेमने की बलि अब पूरी तरह बंद कर दी गई है।

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