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Bihar Holi Celebration : ढोल-मजीरे की ताल या डीजे का धमाल? दरभंगा केवटी की होली का बदला हाल

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इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।



विजय कुमार राय, केवटी ( दरभंगा ) । फागुन की बयार चलती है तो दरभंगा जिले के गांवों में आज भी कहीं-कहीं चौताल और डेढ़ताल की मधुर गूंज सुनाई दे जाती है। कभी यही स्वर पूरे इलाके की पहचान थे—ढोलक की थाप, मजीरे की झंकार और “अवध मा होली खेलैं रघुवीरा…” जैसे लोकगीतों से रातभर सजती चौपालें।

हर दरवाजे पर महफिल, हर आंगन में अबीर, और हर चेहरे पर अपनापन—होली केवल रंगों का नहीं, रिश्तों का उत्सव हुआ करती थी। लेकिन बदलते दौर में तस्वीर कुछ और है। अब डीजे के तेज और फूहड़ गानों के बीच पारंपरिक फाग की तान दबती नजर आती है।

युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, चौपालें सिमट रही हैं, और ढोल-मजीरे की जगह इलेक्ट्रानिक बीट्स ने ले ली है। सवाल उठता है—क्या आधुनिकता की इस आपाधापी में दरभंगा जिले की लोक होली सचमुच बदल गई है, या फिर परंपरा अब भी किसी कोने में अपनी थाप बचाए हुए है?
रंग, रस और रिश्ते... कहां खो गई आंगन वाली होली?

केवटी प्रखंड की कुछ गांवों में होली उत्सव को लेकर गांव- गांव में चौताल डेढ़ताल होली गीतों की धूम है। संस्मरण में कुछ गीत युवाओं को जरूर याद है पर जिस तरह पहले होली होती थी अब वह देखने को नहीं मिलता है।

आधुनिक फूहड़ गीतों से सजे डीजे की धुन पर लोग होली तो जरूर खेलते हैं परंतु अवध में जिस तरीके से होली गीतों पर बुजुर्ग, महिलाएं व युवा थिरकते थे वह अब बहुत कम देखने को मिलती है।

बसंत ऋतु खत्म होते ही होली के गीत लोग गुनगुनाने लगते थे। लोकगीतों में सुमार चौताल, डेढ़ ताल, बारहमासी, धमार (फगुआ) और ऊपर से ढोलक की थाप से लोग झूम उठते थे।

अवध मा होली खेलैं रघुवीरा अवध मा होली...। इसी गीत से होली परवान चढ़ती थी और एक माह तक गांव के हर दरवाजे पर रात में महफिल जमती थी। इसके लिए पहले से दिन तय होता था कि किस दिन किसके दरवाजे पर कार्यक्रम होगा।

उस दिन लोग बड़े चाव से पकवान, मिष्ठान व अन्य खाने की वस्तुएं लोगों को खिलाते थे और अबीर लगाकर होली के आगमन की बधाई देते थे।\“होलिका दहन के दिन पूरी रात फगुआ गीतों की बयार चलती थी और रात में ही होलिका दहन भी किया जाता था।

रात में चौताल(उतार चढ़ाव के चार ताल) शुरू होता था। मंदोदरि कहत पुकारी, हरि लायो है जनक दुलारी। अकिलिया है मारी..। ढोल, मजीरे व हारमोनियम की ताल पर लोग ठुमके लगाते थे। बीच-बीच में बारहमासा गीत भी होता था। बालम बंगलिनियां लुभाए, वहका बरहौ महिनवां रोवाए, गजब दुख ढाये..।

डेढ़ ताल में भी खूब रस होता है। बेटा बिगड़ेव नंद बाबा का, मोहन मारैं डाका। घर से निकलब दुर्लभ होइगा दइया, नारि नई देखि गेछै कन्हैया...।\“ फ़ाग गवैया परसा विशनपुर गांव के भरत यादव ने बताया कि फागुन माह लगते ही घर- घर चौपाल में चौताल, डेढ़ताल का मधुर गीत गायन शुरू हो जाता है।

फगुआ गीत गवैयों की टोली घर- घर पहुंच कर पारंपरिक गीतों को गाकर बुजुर्गों की विरासत को जीवित किये हुए हैं। बगधा गांव के कृष्ण कुमार यादव गोनू , पैगंबरपुर गांव के नसीब लाल साह, बरही गांव के रामपुकार यादव , दरिमा गांव के गंगा पासवान आदि ने बताया कि आधुनिक दौर में होली उत्सव में चौताल गायन की परंपरा अब विलुप्त सा हो रही है।

फागुन मास प्रारंभ होते ही होली की तैयारी को लेकर पहले काफी उत्साह रहता था। अब आधुनिकता के आपाधापी भागदौड़ में होली उत्सव का प्यार स्नेह व भाईचारा भी विलुप्त होने के कगार पर दिख रहा है।

बुजुर्ग बताते हैं कि बड़े बुजुर्ग युवाओं की टोलियां घर- घर घूमकर चौताल डेढ़ताल होली में फाग गाने निकलती थी। सभी एक साथ बैठकर होली गीतों का आनंद लेते थे।

अब डीजे के अश्लील गानों के चलते फ़ाग के राग व रंग भी प्रभावित हो रहे हैं। बड़े पैमाने पर ग्रामीण क्षेत्रों से युवा शहरों में पलायन होने से गांव में होली गायन की परंपरा कम होती जा रही है। जिससे फाग गाने व ढोलक की थाप सुनने के लिए लोगों के कान तरस गए हैं।
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