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जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, आठ वर्ष बाद आतंक पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश

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2003 में आतंकी हमले में मारी गई थी जुबेदा बेगम, परिवार को नहीं मिला था मुआवजा।



जेएनएफ, जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने आतंकवादी हमले में मारी गई महिला के परिवार को मुआवजा देने से इनकार करने के प्रशासनिक फैसले को रद्द करते हुए इसे मनमाना करार दिया है। न्यायालय ने कहा कि कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार का दायित्व है कि वह आतंक पीड़ित परिवारों को न्याय और राहत सुनिश्चितकरें।

न्यायमूर्ति एमए चौधरी ने 72 वर्षीय सब्जा बेगम और उनके पुत्र जाकिर हुसैन मलिक की याचिका स्वीकार करते हुए पुंछ के उपायुक्त की ओर से जारी आदेश को निरस्त कर दिया। उपायुक्त ने शेष अनुग्रह राशि देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि दावा समय सीमा से बाहर है। न्यायालय ने प्रशासन को 2019 की संशोधित केंद्रीय योजना के तहत मामले पर पुनर्विचार कर शीघ्र मुआवजा तय करने के निर्देश दिए।

यह मामला 27 जुलाई 2003 का है, जब सुरनकोट के फजलाबाद क्षेत्र में आतंकियों ने याचिकाकर्ताओं के घर पर हमला किया था। हमले में सब्जा बेगम के साथ मारपीट की गई। उनकी 28 वर्षीय बेटी जुबेदा बेगम की गोली मारकर हत्या कर दी गई और घर को आग के हवाले कर दिया गया। बताया गया कि सब्जा बेगम के एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) के रूप में कार्यरत होने के कारण उनकी बेटी को निशाना बनाया गया।

उस समय परिवार को केवल एक लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी गई थी। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आतंक पीड़ित परिवारों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे गहरे आघात और दुख के बीच कठोर समयसीमा का पालन करें। न्यायालय ने कहा कि सीमाबंदी का तर्क आतंक पीड़ितों को न्याय से वंचित करने का हथियार नहीं बन सकता।
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