बरसाना लठामार होली: नई बहुएं सीख रहीं गुर... तीन पीढ़ियों की लाठी, श्रद्धा और नारी शक्ति का संदेश
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/22/article/image/lathamar-holi-file-1771754242526_m.webpफाइल फाेटो।
किशन चौहान, जागरण, बरसाना। यही तो होली के रंग हैं। बरसाना की जगप्रसिद्ध लठामार होली में आस्था भी है और श्रद्धा भी। श्रद्धा की इस होली में तीन पीढ़ियों की लाठी यह गवाही दे रही है कि यह होली कितना महत्वपूर्ण है। नई-नवेली दुल्हन के लिए भी लठामार होली जरूरी है। इसीलिए किसी को सास लठ चलाना सिखाकर तैयार कर रही हैं, तो किसी को दादी सास लाठी चलाने के गुर सिखा रही हैं।
नई बहुएं सास और दादी सास से सीख रही हैं हुरियारों पर लठ चलाने के गुर
ब्रज में लठामार होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि कृष्ण और राधा की प्रेम परंपरा का जीवंत लोक रूप है। इसी परंपरा को निभाने के लिए इन दिनों घर-घर लाठी चलाने का अभ्यास चल रहा है।
बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को लाठी चलाने की लय और मर्यादा सिखा रही हैं। इस बार लठामार होली में तीन पीढ़ियों की भागीदारी इसे और खास बनाएगी। शृंगार की कोमलता और लट्ठ की दृढ़ता के साथ ब्रज की नारी एक बार फिर परंपरा, आस्था और शक्ति का अद्भुत संदेश देती नजर आएगी।
नारी शक्ति का संदेश देती है बरसाना की लठामार होली
बरसाना की लठामार होली इस बार 25 फरवरी को है। इससे बरसाना की हुरियारिन नंदगांव के हुरियारों पर लठ बरसाएंगी और वह अपनी ढाल पर लठ का हर वार रोकेंगे। पहली बार लठामार होली खेलने के लिए सोनिया शर्मा तैयारी कर रही हैं। कहती हैं कि होली टीवी और अखबारों में देखी थी, लेकिन इस बार खुद इसका हिस्सा बनने का अवसर मिल रहा है। अपनी दादी सास से लठ चलाना सीख रही हैं।
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श्रद्धा कनिष्क श्रोत्रिय कहती हैं कि यह उनकी पहली होली है। एक माह से अपनी सास वंदना लठ चलाना सीख रही हैं। मनीषा शर्मा कहती हैं कि यह उनका सौभाग्य है कि उन्हें बरसाना में ससुराल मिली है। जिस लठामार होली को देखने के लिए लोग तरसते हैं, उसमें हमें सहभागिता करने का मौका मिलेगा।
शृंगार के साथ शक्ति का प्रतीक
ब्रज संस्कृति में लठामार होली नारी शक्ति का प्रतीक है। पारंपरिक लहंगा ओढ़नी, गहने और सोलह शृंगार से सजी महिलाएं जब हाथ में लठ उठाती हैं, तो यह संदेश देती हैं कि सौंदर्य और साहस साथ-साथ चल सकते हैं। दादी सास लीलावती गोस्वामी बताती हैं कि पहले उनके समय में भी इसी तरह आंगन में अभ्यास होता था। अब वही परंपरा बहुओं को सिखाई जा रही है ताकि उत्सव की मर्यादा और आनंद दोनों बने रहें।
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