सेहत की बात: होली में रंग खेलने से पहले ये सावधानी बरतें, वरना कैंसर तक का खतरा, पढ़ें एक्सपर्ट की राय
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/23/article/image/Holi-2026-1771850507913_m.webpजागरण संवाददाता, कानपुर। Holi 2026: समय के साथ-साथ टेसू के फूलों से खेली जाने वाली होली आज रासायनिक रंगों तक सिमट कर रह गई है। होली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रासायनिक रंग भी बिकना शुरू हो गया है। जो शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक होते हैं। होली पर रासायनिक रंगों की तड़क-भड़क ने फागुनी रंगत को फीका कर दिया है। उत्सव में रासायनिक रंग का दुष्प्रभाव हर वर्ष त्वचा, नेत्र रोग सहित कई गंभीरता कारण बनता है।
हर्बल रंगों के मुकाबले रासायनिक रंग सस्ते होने के कारण इनकी बिक्री खूब होती है। इसलिए मुनाफे के लिए दुकानदार इन्हें बेचने से परहेज नहीं करते। यह रंग जहां सेहत के लिए हानिकारक हैं। मैटेलिक रंग से स्किन कैंसर और एल्युमिनियम तथा लौह के मिश्रण युक्त रंग के किडनी बीमारी का खतरा होता है। इसी प्रकार हरे रंग में प्रयोग होने वाले कापर सल्फेट त्वचा और आंख के लिए नुकसानदायक है। वहीं, बैंगनी रंग में प्रयोग होने वाला क्रोमियम आयोडाइड दमा और एलर्जी का कारण बनता है। पेश है, उत्सव के रंग में रासायनिक रंग से बचाव के लिए जागरूक करती जागरण संवाददाता अंकुश शुक्ल की रिपोर्ट...
रासायनिक रंग के प्रयोग से शरीर की त्वचा शुष्क हो जाती है, इससे त्वचा चटकने लगती है और कई बार एलर्जी का विकराल रूप ले लेती है। चेहरे व शरीर पर लाल दाने पड़ जाते हैं। आंखों में रासायनिक रंग चला जाए तो रोशनी जाने का खतरा रहता है। रासायनिक रंगों से सबसे ज्यादा नुकसान आंख की कार्निया को होता है। जो रंग में प्रयोग होने वाले रासायनिक कण के जाने से घाव में बदल जाता है और रोशनी को प्रभावित करता है।
जीएसवीएम मेडिकल कालेज के त्वचा रोग विशेषज्ञ डा. डीपी शिवहरे ने बताया कि मैटेलिक रंग के ज्यादा इस्तेमाल से स्किन कैंसर, एल्युमिनियम और लौह के मिश्रण युक्त रंग के ज्यादा प्रयोग से किडनी की बीमारी होने का भी खतरा रहता है। काले रंग में लेड आक्साइड इस्तेमाल होता है, जो गुर्दे के साथ मस्तिष्क को कमजोर करता है। इसी प्रकार हरे रंग में कापर सल्फेट पाउडर का इस्तेमाल होता है। जो आंखों में जलन, सूजन के साथ ही अंधत्व का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि सिल्वर रंग में एल्युमिनियम ब्रोमाइड कैंसर और नीले रंग का प्रशिया ब्लू त्वचा रोग, लाल रंग का मरक्यूरी सल्फाइड त्वचा कैंसर का कारण बनता है। हर बार होली के बाद रासायनिक रंग से ग्रसित मरीज बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
नेत्र रोग और चेस्ट चिकित्सालय में हर बार बढ़ते मरीज
जीएसवीएम मेडिकल कालेज की नेत्र रोग विशेषज्ञ प्रो. शालिनी मोहन ने बताया कि हर बार होली के बाद कार्निया में घाव, आंख में रंग जाने से लालिमा के मरीज बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। वहीं, मुरारी लाल चेस्ट चिकित्सालय के प्रो. संजय वर्मा ने बताया कि रासायनिक गुलाल सांस के रास्ते फेफड़े और गले तक पहुंचता है, जो अस्थमा और सीने तथा गले में संक्रमण को बढ़ा देता है।
होली से पहले करें तैयारी
[*]अच्छी तरह माइस्चराइजर, नारियल व जैतुन का तेल, एलोवेरा जेल त्वचा, बालों व नाखूनों पर लगाएं।
[*]रंग खेलने से पहले शरीर व बालों को कपड़े से अच्छी तरह ढक लें।
[*]रंग खेलने से पहले पर्याप्त मात्रा में पानी व जूस का सेवन करें।
[*]केवल हर्बल रंगों और गुलाल का ही प्रयोग करें।
[*]रंग छुड़ाने के लिए माइल्ड सोप, शैम्पू या हल्दी, बेसन व शहद के पेस्ट का इस्तेमाल करें।
[*]रंग लगाने पर अगर त्वचा कोई रिएक्शन हो तो पानी से धोकर माइस्चराइजर लगाएं व डाक्टर को दिखाएं।
यह करने से बचें
[*]केमिकल युक्त रंग का प्रयोग न करें।
[*]बहुत देर शरीर पर रंग न लगाए रहें।
[*]धूप में देर तक होली भी न खेलें।
[*]एक बार में रंग छुड़ाने का प्रयास न करें।
[*]रंग छुड़ाने में डिटर्जेंट या केरोसीन का प्रयोग न करें।
[*]आंख में रंग जाने पर रगड़े नहीं, गुनगुने पानी से धोएं।
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