पटना हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: विवाहित महिला की मौत पर भाई भी होगा ‘पीड़ित’; अपील में बन सकेगा पक्षकार
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/24/article/image/Patna-HC-1771948884944_m.webpपटना हाईकोर्ट ने की अहम व्याख्या। सांकेतिक तस्वीर
विधि संवाददाता, पटना। पटना हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी विवाहित महिला की अस्वाभाविक मृत्यु के मामले में उसका भाई भी विधिक उत्तराधिकारी होने के नाते ‘पीड़ित’ की श्रेणी में आएगा और वह आपराधिक अपील में पक्षकार बन सकता है।
न्यायाधीश बिबेक चौधरी एवं न्यायाधीश डॉ. अंशुमान की खंडपीठ ने क्रिमिनल अपील (डीबी) संख्या 1486/2025 में यह आदेश पारित किया।
मामला शेखपुरा थाना कांड संख्या 657/2023 से जुड़ा है। मृतका को गोली लगने से गंभीर चोट आई थी। प्रारंभ में पति मनोज कुमार द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में धारा 307 आईपीसी एवं आर्म्स एक्ट की धारा 27 लगाई गई थी, लेकिन बाद में मृत्यु हो जाने पर धारा 302 आईपीसी जोड़ दी गई।
पति को कोर्ट ने सुनाई आजीवन कारावास की सजा
जांच के दौरान पुलिस ने पति को ही आरोपी मानते हुए आरोप-पत्र दाखिल किया। सत्र वाद संख्या 10/2024 में 8 अगस्त 2025 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी पति को धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
दोषसिद्धि के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट के समक्ष अपील दायर की । उक्त अपील में मृतका के भाई ने हस्तक्षेप याचिका दाखिल कर स्वयं को ‘पीड़ित’ बताते हुए पक्षकार बनाने की मांग की।
भाई ने स्वयं को बताया था पीड़ित
अपीलकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता अजय कुमार ठाकुर ने दलील दी कि भाई न तो अभिभावक है और न ही वैधानिक उत्तराधिकारी, इसलिए उसे पीड़ित का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
खंडपीठ ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15 का हवाला देते हुए कहा कि विवाहित महिला का भाई वैधानिक उत्तराधिकारी की श्रेणी में आता है।
अदालत ने हस्तक्षेप याचिका स्वीकार करते हुए भाई का नाम अपील में प्रतिवादी संख्या-2 के रूप में जोड़ने का निर्देश दिया और मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।
सास के खिलाफ दहेज उत्पीड़न मामला हाई कोर्ट ने किया रद
दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक अहम मामले में पटना हाईकोर्ट ने सास के विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद कर दिया है।
न्यायाधीश सौरेन्द्र पांडेय की एकलपीठ ने क्रिमिनल मिसलेनियस संख्या 140/2025 में सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
औरंगाबाद जिले का है मामला
मामला औरंगाबाद महिला थाना कांड संख्या 61/2023 से संबंधित है। परिवादिनी सिमरन कुमारी ने आरोप लगाया था कि 28 जून 2023 को शादी के समय 30 लाख रुपये नकद, आभूषण व अन्य सामान दिए गए थे।
इसके बावजूद पति सनी कुमार और सास सुमित्रा देवी द्वारा मोटरसाइकिल और हीरे की अंगूठी की मांग की गई। मांग पूरी नहीं होने पर मारपीट, गाली-गलौज और उत्पीड़न का आरोप लगाया गया।
पुलिस ने अनुसंधान के बाद आईपीसी की धाराओं 341, 323, 498A, 504, 506, 34 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत आरोप-पत्र दाखिल किया था, जिस पर निचली अदालत ने संज्ञान लिया।
सास की ओर से दी गई थी फंसाए जाने की दलील
याचिकाकर्ता सास की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप हैं तथा वे वैवाहिक विवाद के कारण फंसाई गई हैं।
वहीं, विपक्ष की ओर से आरोपों को गंभीर बताया गया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले (डारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य)का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में परिवार के अन्य सदस्यों को सामान्य आरोपों के आधार पर अभियोजन में घसीटना न्यायोचित नहीं है।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध ठोस एवं विशिष्ट साक्ष्य का अभाव है। इसी आधार पर अदालत ने 2 अप्रैल 2024 को लिए गए संज्ञान आदेश को सुमित्रा देवी के संदर्भ में रद करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।https://www.jagranimages.com/images/womenday2_780x100.jpghttps://www.jagranimages.com/images/womendayANI2_380x100.gif
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