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कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका के बीच अमेरिका न ...


वाशिंगटन। अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने रूस के तेल पर लगाए गए प्रतिबंधों में दी गई अस्थायी छूट का बचाव किया। उन्होंने कहा कि इस फैसले से दुनिया भर में तेल की कीमतों में अचानक बड़ी बढ़ोतरी होने से रोका जा सका। हालांकि, डेमोक्रेट नेताओं ने चेतावनी दी कि इससे रूस को युद्ध के लिए पैसा मिल सकता है और ईंधन महंगा बना रह सकता है।
सीनेट की एक समिति के सामने बोलते हुए बेसेंट ने कहा कि यह कदम उस समय उठाया गया जब बाजार में काफी अनिश्चितता थी, ताकि तेल की सप्लाई स्थिर रखी जा सके।




    उन्होंने बताया, “हम 25 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल बाजार में बनाए रखने में सफल रहे।”
    बेसेंट ने कहा कि अगर यह छूट नहीं दी जाती, तो कीमतें और ज्यादा बढ़ सकती थीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “आज तेल की कीमत करीब 100 डॉलर है। अगर हमने यह राहत नहीं दी होती, तो यह 150 डॉलर तक जा सकती थी।” उन्होंने कहा कि यह नीति आम लोगों को राहत देने के लिए बनाई गई है। कम कीमत लोगों के लिए बेहतर है।
    वहीं, डेमोक्रेट नेताओं ने इस फैसले का विरोध किया। क्रिस कून्स ने कहा कि इस छूट से रूस को अरबों डॉलर मिल सकते हैं और इससे उस पर दबाव कम हो जाएगा, जो इस समय बहुत जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि आम लोग आज भी महंगा पेट्रोल खरीद रहे हैं। उन्होंने कहा, “डेलावेयर में लोग 4 डॉलर प्रति गैलन के हिसाब से पेट्रोल खरीद रहे हैं।”




    कून्स ने सवाल उठाया कि क्या इस नीति से सच में लोगों को कोई राहत मिली है। इस पर बेसेंट ने जवाब दिया कि रूस या ईरान को इससे कोई बड़ा फायदा नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “मैं इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूं।”
    उन्होंने बताया कि इस छूट को बढ़ाने का फैसला दुनिया के कई गरीब और कमजोर देशों की मांग पर लिया गया था। उन्होंने कहा, “10 से ज्यादा गरीब देशों ने हमसे इस छूट को बढ़ाने की अपील की थी, इसलिए इसे सिर्फ 30 दिनों के लिए बढ़ाया गया।”




    इसी बीच, कुछ नेताओं ने बढ़ती ईंधन कीमतों पर भी चिंता जताई। जैक रीड ने कहा कि अमेरिका में लोग 4 डॉलर प्रति गैलन से ज्यादा कीमत पर पेट्रोल खरीद रहे हैं, जो आम परिवारों पर बोझ है।
    बेसेंट ने कहा कि बाजार के हालात धीरे-धीरे बेहतर हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि तेल बाजार इस समय “बैकवर्डेशन” की स्थिति में है, यानी आगे चलकर कीमतें कम हो सकती हैं।
    उन्होंने उम्मीद जताई, “मुझे लगता है कि यह संघर्ष खत्म होगा और पेट्रोल की कीमतें फिर पहले जैसी या उससे भी कम हो जाएंगी।”




    यह पूरी बहस अमेरिका की राजनीति में मतभेद को दिखाती है। सरकार का कहना है कि थोड़ी लचीलापन रखने से बाजार स्थिर रहता है, जबकि आलोचकों का मानना है कि इससे रूस पर दबाव कम होता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध पश्चिमी देशों की नीति का अहम हिस्सा रहे हैं। कोशिश यह रही है कि रूस की कमाई कम हो, लेकिन दुनिया में तेल की सप्लाई पर बड़ा असर न पड़े।
    दुनिया में तेल की कीमतें अब भी अंतरराष्ट्रीय तनाव, खासकर मध्य पूर्व की स्थिति से प्रभावित होती हैं। वहां किसी भी तरह की गड़बड़ी से कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जिसका असर भारत जैसे बड़े तेल आयात करने वाले देशों पर भी पड़ता है।




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