ललित सुरजन की कलम से—चुनावों में बदजुबानी ... ...
देश के इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी अपना उत्तरदायित्व समझने की बेहद आवश्यकता है। प्रिंट मीडिया याने अखबार में छपी बात तो एक सीमित दायरे में ही फैलती है, लेकिन टीवी पर वही बात दैत्याकार रूप ग्रहण कर लेती है। एक तो चैनलों की संख्या बहुत ज्यादा है। उन सब पर एक ही समय में खबर फूटती है, फिर बार-बार का प्रसारण होने से वह बात चर्चा में लगातार बनी रहती है। कोई अच्छी बात टीवी के माध्यम से दूर-दूर तक पहुंचे तब तो उसका स्वागत है, लेकिन जनता को अभद्र, अश्लील, अनर्गल, अशिष्ट चर्चाएं सुनने के लिए अभिशप्त क्यों किया जाए? इसमें यह बिन्दु भी है कि एक चुनाव क्षेत्र में कही गई बात बचे पांचसौ चालीस क्षेत्रों तक अनावश्यक रूप से पहुंच जाती है, जिनका उससे कोई लेना-देना नहीं होता। मुझे गुरुनानक की बोधकथा का ध्यान आता है कि एक लड़ाई-झगड़े वाले गांव केसारे लोग उसी गांव में रहे आएं ताकि उनका बुरा आचरण वहीं तक सीमित रहे, जबकि समझदारों के गांव के सारे लोग बिखर जाएं ताकि वे दूर-दूर जाकरसमझदारी फैला सकें।
(देशबन्धु में 24 अप्रैल 2014 को प्रकाशित)
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Deshbandhu Desk
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