deltin55 Publish time 1970-1-1 05:00:00

टीएमसी में बगावत और दलबदल कानून पर विचार की ...


प.बंगाल में चुनाव हारते ही तृणमूल कांग्रेस के कई विधायकों और सांसदों को पार्टी की मुखिया ममता बनर्जी में बुराई दिखने लगी। 15 बरसों के टीएमसी शासन को अधिनायकवाद कहा गया और अब दावा किया जा रहा है कि वाकई लोकतंत्र की जीत हुई है। पाठक जानते हैं कि प.बंगाल में इस बार तृणमूल कांग्रेस को महज 80 सीटें ही मिलीं और उनमें भी अब 60 विधायकों ने बगावत कर अपना नया नेता सदन में चुन लिया है। इसके बाद लोकसभा में भी टीएमसी के कुल 28 में से 20 सांसदों के टूटने की खबरें हैं। खबर है किटीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर बैठक की, यहां पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी उनसे मिले थे। इसी बैठक में यह फ़ैसला किया गया कि दस्तीदार के नेतृत्व में सांसदों को अलग बिठाने की मांग की जाए। यह भी बताया जा रहा है कि शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल सांसद शताब्दी राय के दिल्ली स्थित आवास जाकर वहां मौजूद कुछ तृणमूल सांसदों से मुलाकात की। संभव है इन अपुष्ट खबरों का सच जल्द सामने आ जाए। लेकिन यह नजर आ रहा है कि टीएमसी सांसदों को तोड़ने का काम बाकायदा भाजपा की देखरेख में हो रहा है।




प.बंगाल विधानसभा में ममता बनर्जी से बगावत कर नेता प्रतिपक्ष बने ऋतब्रत बनर्जी ने कहा, मुझे पता चला कि बीस सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन वास्तव में, दो-तिहाई से भी अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता, लेकिन तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ उठ रही है और लोकतंत्र के लिए यह काफ़ी अहम है। ऋतब्रत बनर्जी ने यह भी कहा कि हो सकता है कि मैं उनके साथ खड़ा न हो सकूं, लेकिन मैं उन्हें ज़रूर बधाई दूंगा कि उन्होंने अधिनायकवाद के ख़िलाफ़ लोकतंत्र की आवाज़ बुलंद की है। ऐसी ही बात सोमवार को राज्यसभा सांसदी और तृणमूल कांग्रेस छोड़ने वाले सुखेंदु शेखर रॉय ने भी कही हैं। इन बयानों में दिख रहा है कि अपनी सुविधा से लोकतंत्र को आड़ बनाकर बगावत को जायज़ ठहराया जा रहा है। लोकतंत्र का मान तो तब रहता, जब पार्टी से अलग होने वाले सांसद या विधायक अपने पदों को भी छोड़ते और जनता के बीच दोबारा पहुंचकर जीत दर्ज करते। लेकिन टीएमसी में ही अलग गुट खड़े करने वाले विधायकों और सांसदों ने पहले तो ममता बनर्जी के नाम और रुतबे का इस्तेमाल कर जीत हासिल की और अब उस जीत को भाजपा के पाले में डालने की चालाकी हो रही है। जिस तानाशाही का जिक्र ये लोग कर रहे हैं, क्या उन्हें भाजपा का यह खेल दिखाई नहीं दे रहा है।




ध्यान रहे कि शिवसेना, एनसीपी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, अभी टीएमसी में भाजपा ने फूट डलवाई है, और कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश तो भाजपा कई बार कर चुकी है। इसके लिए चाहे जांच एजेंसियों का दबाव डाला जाए या राज्यसभा सांसदी अथवा किसी आयोग, निगम में नियुक्ति का लालच दिया जाए, भाजपा की ऐसी तिकड़मों से अब सभी वाकिफ हो चुके हैं। फिर भी जब भी किसी दल में टूट पड़ती है, उसके मुखिया की कमियां गिनाई जाने लगती हैं। इस समय ममता बनर्जी तानाशाह की तरह पेश की जा रही हैं, उससे पहले उद्धव ठाकरे पर हिंदुत्व के खिलाफ जाने के आरोप लगे, शरद पवार पर वंशवाद को बढ़ावा देने का दोष मढ़ा गया, और कांग्रेस में तो गांधी परिवार ही पार्टी छोड़ने वालों की आंख की किरकिरी बना रहता है। मीडिया भी दलबदल करने वालों या बागियों के फैसले को भाजपा के मास्टर स्ट्रोक की तरह पेश करने लगा है। मीडिया के दायरे से यह चिंता बाहर हो चुकी है कि क्या ऐसे मास्टर स्ट्रोक लोकतंत्र के लिए घातक नहीं हैं। क्या दल तोड़ने को राजनैतिक गुंडागर्दी की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में विचारों की लड़ाई होती है और विचारधारा अहम होती है, लेकिन जब सत्ता का सुख ही प्रधान हो और विचारधारा का महत्व फैंसी ड्रेस जैसा हो जाए कि थोड़े वक्त के दिखावे के लिए उसे पहना जाए, तो क्या लोकतंत्र बच पाएगा, यह गंभीर सवाल इस समय खड़ा है।




टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने बागी सांसदों के लिए बिल्कुल सही लिखा है कि, ये सांसद 2024 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतकर संसद पहुंचे थे। जनता ने उन्हें एनडीए के लिए नहीं, बल्कि टीएमसी के प्रतिनिधि के रूप में चुना था। जो भी स्वार्थी और अवसरवादी लोग अपने निजी हितों के लिए पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे बेझिझक भाजपा में शामिल हो सकते हैं। लेकिन पहले उन्हें अपने सांसद पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए और फिर भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए। तब पता चल जाएगा कि वे वास्तव में कितने बड़े जननेता हैं और जनता उनके साथ है या नहीं।




टीएमसी के साथ इस समय जो कुछ घट रहा है, वह आगे टीडीपी, एलजेपी, जेडीयू किसी के भी साथ घट सकता है। अब यह सामान्य धारणा बनती जा रही है कि भाजपा के रहते कोई भी दल टूटने के खतरे से बचा नहीं है। शतरंज की बिसात पर प्यादों को आगे बढ़ाकर, हाथी-घोड़े-ऊंट की चालें चलकर शह और मात का खेल असल राजनीति में खेला जा रहा है, जो सत्ता पर बने रहने के लिहाज से रोचक हो सकता है, मगर इसमें बार-बार लोकतंत्र को बिसात के बाहर धकेला जाना देश के लिए घातक है। ऐसे में जरूरी है कि संविधान की दसवीं अनुसूची पर पुनर्विचार किया जाए और माननीय सर्वोच्च न्यायालय इसमें स्वत: संज्ञान ले। इस समय दसवीं अनुसूची के तहत किसी भी विलय को वैध मानने के लिए मूल पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के विलय के सिद्धांत पर कोई गंभीरता से जोर नहीं दे रहा है। अलग हुए गुट, चाहे वह तीन-चौथाई हो या लगभग सौ प्रतिशत, अयोग्यता से बचने नहीं चाहिए। मूल पार्टी के अनुशासन को न मानने का मतलब स्वत: पार्टी छोड़ना ही माना जाना चाहिए। तभी इस तरह का दलबदल रोका जा सकेगा।




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Deshbandhu Desk



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