बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामला: गौला पुल की जांच से शुरू होकर, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/25/article/image/hammer-1772001373534_m.webpवर्ष 2016 को हाईकोर्ट नैनीताल में गया बनभूलपुरा रेल भूमि अतिक्रमण का मामला. Concept
जागरण संवाददाता, हल्द्वानी । चर्चाओं में बना हुआ बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामला करीब 13 साल पहले गौला पुल के गिरने के कारणों की जांच से शुरू हुआ था। जब वर्ष 2013 में अवैध खनन व गौला पुल के गिरने के कारणों की जांच के लिए याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी ने उत्तराखंड हाई कोर्ट में पीआइएल दाखिल की थी।
इस दौरान कोर्ट कमिश्नर की आख्या में गौला पुल के गिरने का मुख्य कारण रेलवे की भूमि पर अवैध अतिक्रमण कर रहे लोगों की वजह से पाया गया। इसके बाद यह मामला बनभूलपुरा में रेलवे की भूमि पर हुए अतिक्रमण तक पहुंच गया।
वर्ष 2016 में अतिक्रमण के मामले पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर हुई थी। इसमें बताया गया था कि बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन पर कई घर, मस्जिद व मदरसे बने हैं। हाई कोर्ट ने इसी वर्ष जब रेलवे से रिपोर्ट मांगी तब बताया गया कि क्षेत्र में 31.87 हेक्टेयर भूमि रेलवे की है। इस भूमि में 4365 घर बसे हैं। इसके बाद से यह मामला हाई कोर्ट में ही चला रहा।
इस दौरान हाईकोर्ट ने रेलवे और अतिक्रमणकारियों से पूछताछ करने के साथ सभी दस्तावेज मांगें और उस पर जांच भी हुई। वर्ष 2016 से कई तारीखें लगने के बाद करीब छह वर्ष बाद दिसंबर 2022 को हाइ कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया।
इसके बाद स्थानीय लोग मामले को 20 दिसंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ले गए। पांच जनवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्टे लग गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाकर सरकार से पहले निवासियों के पुनर्वास के लिए समाधान खोजने को कहा गया था।
पिछले वर्ष नवंबर से पांच बार टली मामले की सुनवाई
हल्द्वानी रेलवे स्टेशन से सटे बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे का दावा है कि 31.87 हेक्टेयर भूमि उनकी है। रेलवे अपनी इस भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए करीब 10 वर्षों से हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में लड़ रही है। वहीं बनभूलपुरा में कई वर्षों से बसे लोग अपनी मेहनत की कमाई से बने घरों को बचाने में सुप्रीम कोर्ट के सहारे हैं। इस मामले को लेकर पिछले वर्ष 14 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
इसमें रेलवे व राज्य सरकार के वकीलों ने अपनी दलीलें सुनाई। सारी दलीलों सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई दो दिसंबर को टाल दी। इस दौरान केस का नंबर न आने से मामला 10 दिसंबर तक टल गया था। इस तारीख पर भी कोई सुनवाई न होने से मामला 16 दिसंबर को चला गया, जहां फिर सुनवाई नहीं हो पाई। इसके बाद अब 24 फरवरी को सुनवाई हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि वह संपूर्ण भूमि रेलवे की है और वर्षों से उसे भूमि पर अवैध रूप से बैठे हुए अतिक्रमणकारियों को अब हटना ही होगा। अतिक्रमणकारी प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पात्रता की श्रेणी में आएंगे उनका नियमानुसार पुनर्वास हो सकता है। रेलवे भूमि पर हुए इस अतिक्रमण की वजह से रेलवे की अनेकों परियोजनाओं का संचालन नहीं हो पाया जिस कारण हल्द्वानी सहित पूरे कुमाऊं का विकास प्रभावित हुआ है। कुछ व्यक्तियों ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए इन अतिक्रमणकारियों को संरक्षण दिया था। - रविशंकर जोशी, याचिकाकर्ता व आरटीआइ एक्टिविस्ट
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