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चित्रकूट में कोषागार घोटाला; 93 खाता से किया गया घोटाला, तीन खातों में 10 करोड़ से अधिक की निकासी

deltin33 2025-10-18 02:07:25 views 1247
  



जागरण संवाददाता, चित्रकूट। कोषागार घोटाला में जुड़े अधिकारी, कर्मचारी और ग्रामीण बिचौलिए शामिल हैं। जांच में 93 खातों से सरकारी धन की निकासी की गई। तीन खातों में करीब 10 करोड़ रुपये की निकासी की गई है। खाताधारक को 10 और बिचौलिया को 20 प्रतिशत कमीशन दिया जाता था। कोषागार से धनराशि भेजने के 24 घंटे से 48 घंटे के बीच रकम निकल ली जाती थी। एसआइटी की जांच में कई नाम सामने आए हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें


पेंशनर शिव प्रसाद के खाते में सर्वाधिक तीन करोड़ 97 लाख 78 हजार 840 रुपये भेजे गए। इसी तरह रामखेलावन के खाते में तीन करोड़ 59 लाख 32 हजार 457, राजेंद्र कुमार के खाते में तीन करोड़ 45 लाख 14 हजार 395, गिरिजेश के खाते में दो करोड़ 20 लाख 80 हजार 725, धनपति देवी के खाते में एक करोड़ 25 लाख 25 हजार 125, लक्ष्मी देवी के खाते में एक करोड़ 21 लाख 17 हजार 355, मोहनलाल के खाते में एक करोड़ 14 लाख 81 हजार 213, सुशीला देवी के खाते में एक करोड़ 84 लाख 77 हजार 232 की धनराशि भेजने के साथ ही निकाले जाने की पुष्टि हुई है।

कुछ खाते ऐसे भी थे जिनमें खाताधारक मौत हो चुकी थी, परंतु विभागीय पक्ष द्वारा वह खाते सक्रिय रखे गए और उनमें लेनदेन किया गया। इधर बिचौलियों व कोषागार कर्मचारियों का एक नेटवर्क काम कर रहा था, इस सिलसिले में सबसे चर्चित नाम संदीप श्रीवास्तव का है, जो वर्तमान में पेंशन पटल देख रहे हैं। करीब एक सप्ताह से वह फरार हैं। जानकारों का कहना है कि सिंडिकेट ने रणनीति के तहत सेवानिवृत्त शिक्षकों या ऐसे खाताधारकों को निशाना बनाया, जो तकनीकी जानकार नहीं थे। ऐसे बुजुर्ग खाताधारक बैंक स्टेटमेंट या लेनदेन की नियमित निगरानी नहीं करते थे। उनके नाम से खाते संचालित करना आसान था। अक्सर रिश्तेदार या नज़दीकी व्यक्ति ही उनके खाते का संचालन करते थे। उदाहरण स्वरूप खंडेहा की 70 वर्षीय कमला देवी का खाता उसके भाई द्वारा संचालित किया जाता था, और उसी खाते से लाखों की निकासी हुई।


सूत्रों की मानें तो इन अधिनियमों में 10 प्रतिशत कमीशन की व्यवस्था थी। यानी खाते के संचालन की जिम्मेदारी बिचौलियां या रिश्तेदारों को दी गई, जो समस्त लेनदेन में से 20 प्रतिशत कमीशन लेते और बाकी रकम अधिकारी व कर्मचारियों तक पहुंच जाती। जिन पटल लिपिक और एटीओ के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है, वे लंबे समय से इधर तैनात हैं, जिससे उनकी पहचान होना स्वाभाविक थी।


एसआइटी (विशेष जांच टीम) ने अब तक 97 नामों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि और नाम सामने आएंगे विशेषकर वे लोग जो पेंशन खातों को संचालित करते थे। बताया गया है कि जैसे ही धनराशि कोषागार से निकलती थी, 24–48 घंटे के भीतर बिचौलियों, खाताधारक और विभागीय लोगों में बांट दी जाती थी। इस सिलसिले में एसआईटी ने शुक्रवार को दिनभर खाताधारकों को कोतवाली बुलाकर उनसे पूछताछ की कि उनका खाता कौन संचालित करता था।

खासकर उन पेंशनर्स में चर्चा जो सार्वजनिक रूप से इस घोटाले के बारे में सुनकर आश्चर्य में थे। यदि कोई बुजुर्ग कोषागार की ओर जाता है, तो आसपास बैठे लोग पूछते हैं, क्या आपके खाते में पैसा आया है? जबकि विभागीय अधिकारी मौन है, बैंक रिकार्ड, खाताधारकों के बयान, बैंक स्टेटमेंट्स और कोषागार रिकार्ड की विस्तृत छानबीन अब एसआइटी का अगला प्रमुख कदम बनने वाला है। यदि अधिकांश आरोपियों की मिलीभगत पाई गई, तो यह घोटाला केवल कोषागार स्तर पर सिमटने की बजाय बृहद जांच का विषय बन सकता है। कुल मिलाकर यह मामला न केवल एक वित्तीय अपकर्षण है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास और सरकारी धन शुद्धता की चुनौती बन चुका है।
गबन काल में तीन वरिष्ठ कोषागार अधिकारियों का रहा कार्यकाल


धनराशि गबन की जांच वित्तीय वर्ष 2017-18 से की जा रही है। इस अवधि में तीन वरिष्ठ कोषाधिकारी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। छह दिसंबर 2014 से 21 सितंबर 2019 तक कमलेश कुमार, 21 सितंबर 2019 से सात अगस्त 2023 तक शैलेश कुमार वरिष्ठ कोषाधिकारी रहे हैं। आठ अगस्त 2023 से रमेश सिंह जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। कोषागार से भेजी जाने वाली धनराशि की पत्रावली में सहायक कोषाधिकारी के अलावा वरिष्ठ कोषाधिकारी के हस्ताक्षर होते हैं। इनके हस्ताक्षर के बगैर एक पैसा कोषागार से आहरित नहीं किया जा सकता। लेकिन यह सभी जिम्मेदार सिर्फ दस्तखत ही बनाते रहे और सिंडिकेट बेधड़क खेल करता रहा।

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