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1971 युद्ध: ललयाली की लड़ाई में दुश्मन के लिए काल बने थे जम्मू के तीन वीर

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1971 युद्ध: ललयाली की लड़ाई में जम्मू के वीरों ने दुश्मन को खदेड़ा



जागरण संवाददाता, जम्मू। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर में अखनूर में ललयाली पोस्ट के लिए लड़ी गई भीषण लड़ाई में आठ जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री (आठ-जैकलाई) के तीन वीर अपने साथियों संग दुश्मन पर काल बनकर टूटे थे। ललयाली पोस्ट हाथ से निकल जाती, तो आज जम्मू के छंब सेक्टर का 48 वर्ग किलोमीटर इलाका पाकिस्तान के कब्जे में होता।

ललयाली की लड़ाई के नायक आठ जैकलाई के वीर चक्र विजेता कर्नल विरेंद्र साही घायल होने के बाद भी दुश्मन से लड़ते रहे। शरीर पर गोलियां लगी थीं, खून बह रहा था, लेकिन वह दुश्मन को खदेड़ने के लिए लड़ते रहे। उनके साथ लड़ रहे लांस नायक मोहन लाल लखोत्रा के शरीर पर भी गोलियां लगी थीं। वह जय दुर्गे, भारत माता की जय के जयघोष लगाते हुए अंतिम सांस तक दुश्मन से लड़े थे।

इन वीरों के साथ परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाना सिंह ने ललयाली के पास ही देवा बटाला इलाके में पाकिस्तानी सैनिकों के साथ लोहा लेकर आठ जैकलाई की वीरता की परंपरा को कायम रखा। ललयाली की लड़ाई में चार्ली कपंनी की कमान संभालने वाले मेजर विरेंद्र साही, वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पीस स्टेशन ग्वालियर मुख्यालय में तैनात थे।

उन्होंने स्टेशन मुख्यालय को पत्र लिखा था कि उन्हें बंगाल में युद्ध क्षेत्र में भेजा जाए। जब इसे स्वीकार नहीं किया गया तो उन्होंने आर्मी चीफ मानेकशा को पत्र लिखकर युद्ध में भेजने का आग्रह किया। इस पर आर्मी चीफ ने निर्देश दिए थे कि अगर युवा अधिकारी युद्ध क्षेत्र में जाना चाहता है तो उसे क्यों रोका जा रहा है। इसके बाद मेजर साही को अखनूर के छंब सेक्टर में लड़ाई के मैदान में भेजा गया।
यह थी पाकिस्तान की साजिश

पाकिस्तान ने बंगाल में भारतीय सेना की कार्रवाई का बदला लेने के लिए जम्मू के छंब सेक्टर को कब्जे में लेने के लिए जम्मू-कश्मीर में तीन दिसंबर, 1971 को आपरेशन गजब छेड़ दिया था। पाकिस्तान अखनूर के पुल को कब्जा कर पूरे क्षेत्र को काटना चाहता था। अखनूर के पुल पर कब्जा होने से पाकिस्तान राजौरी, पुंछ जिलों पर काबिज हो जाता। छंब सेक्टर की ललयाली पोस्ट उसकी राह का रोड़ा थी। सेना की 10 डिवीजन के अन्य इलाकों में पाकिस्तानी सेना घुस आई थी। सिर्फ ललयाली पोस्ट ही ऐसी थी, जिसपर दुश्मन को रोकर उसके मंसूबों को नाकाम बना दिया गया।
हमने दुश्मन से हाथों-हाथ लड़ाई लड़ी: साही

सेनानिवृत्त कर्नल विरेंद्र साही ने बताया कि ललयाली पोस्ट सेना के लिए बहुत मायने रखती थी। मेरी कंपनी में 117 लोग थे, इनमें एक लांस नायक मोहन लाल लखोत्रा भी थे। दुश्मन ने हम पर हमला कर दिया था। हमारे लिए करो जा मरो के हालात थे। पीने के लिए पानी तक नहीं था। ऐसे हालात में हमने दुश्मन से लोहा लेने के साथ उससे हाथों हाथ लड़ाई लड़ उसे पीछे खदेड़ दिया। ललयाली के अग्रिम इलाके में पहुंचे दुश्मन को रोकने के लिए पांच-छह दिसंबर, 1971 की रात को भीषण लड़ाई लड़ी गई थी। हमने हाथ-हाथ की लड़ाई लड़ी व मेरे साथ मेरे कई साथी लड़ते हुए गोलियां लगने से घायल हो गए।

\“\“इस दौरान मेरी कार्बाइन जाम हो गई और दुश्मन के कंपनी कमांडर को मैंने अपनी संगीन से मार गिराया। दुश्मन के कंपनी कमांडर की मौत व हमारे सैनिकों द्वारा अन्य दुश्मन सैनिकों को मार गिराए जाने के बाद हमने दुश्मन को अपनी चौकी से खदेड़ दिया था। मेरे साथ लड़ रहे वीर चक्र विजेता लांस नायक मोहन लाल लखोत्रा बलिदान हुए थे। हमने दुश्मन के कब्जे से ललयाली के अग्रिम इलाके को वापस लेकर तिरंगा फहरा दिया था। कर्नल साही ने कहा कि इस लड़ाई में हमारे 17 सैनिक बलिदान हुए थे, जबकि हमने दुश्मन के 87 सैनिकों के शव लौटाए थे। मेरे शरीर पर 200 टांके लगे हैं।\“\“
हमने दुश्मन को परास्त कर पीछे खदेड़ा: बाना सिंह

वहीं आठ जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंटरी के परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाना सिंह ने कहा कि वह 1971 के युद्ध में छंब सेक्टर के देवा बटाला में तैनात थे। मुझे सेना में शामिल हुए सिर्फ तीन साल हुए थे। युद्ध में हिस्सा लेने का यह मेरा पहला अनुभव था। हमने दुश्मन को परास्त कर उसे पीछे खदेड़ दिया था। इसी युद्ध में हासिल अनुभव ने मुझे एक मजबूत सैनिक बनाया। बाद में हमने लद्दाख में सियाचिन ग्लेशियर की कायद चौकी को वापस लिया था। इसके लिए मुझे परमवीर चक्र मिला।

कैप्टन बाना सिंह ने कहा कि वर्ष 1971 का युद्ध सबसे खराब परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों के उच्च मनोबल, अटूट संकल्प, जीतने के अडिग विश्वास व देश के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक था। विपरीत हालात में अंत तक लड़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति ने हमें जीत दिलवाई। यह भारतीय सेना का मूलमंत्र
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