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सांकेतिक तस्वीर
जागरण संवाददाता, बड़ौत (बागपत)। वर्ष 1973 से पहले के रक्षा कर्मियों के लिए आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल क्षेत्रीय पीठ लखनऊ ने बावली गांव के रहने वाले पूर्व सैनिक हरपाल सिंह को इनवैलिड पेंशन (अयोग्यता/चिकित्सीय आधार पर पेंशन) देने के आदेश जारी किए हैं। ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश के अनुपालन में देरी होने पर संबंधित विभाग को आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।
वादी पूर्व सैनिक हरपाल सिंह के अधिवक्ता सेवानिवृत्त विंग कमांडर पुष्पेंद्र कुमार ढाका ने बताया कि हरपाल सिंह वर्ष 1960 में सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1970 में मेडिकल आधार पर उन्हें सेवा से हटा दिया गया। वर्ष 2022 में बागपत में पूर्व सैनिकों के एक कार्यक्रम में वह मिले तो हरपाल सिंह ने प्रकरण की जानकारी देते हुए न्याय दिलाने का अनुरोध किया।
इसके बाद उन्होंने इस मामले की वर्ष 2023 में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल क्षेत्रीय पीठ लखनऊ में अपील की। तीन साल तक केस लड़ने के बाद फैसला आ गया है। पूर्व सैनिक हरपाल सिंह को इनवैलिड पेंशन (अयोग्यता/चिकित्सीय आधार पर पेंशन) देने के आदेश जारी किए हैं। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि आदेश के अनुपालन में देरी होने पर संबंधित विभाग को आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।
1960 में भर्ती, 1970 में सेवा से हटाया
अधिवक्ता पुष्पेंद्र कुमार ढाका ने बताया कि इस प्रकरण के अभिलेखों के अनुसार हरपाल सिंह की सेना में प्रारंभिक भर्ती 13 अक्टूबर 1960 को हुई थी, जिसके बाद में उन्हें 10 अप्रैल 1963 को रिक्रूट के रूप में शामिल किया गया। उन्हें सात मार्च 1970 को लो मेडिकल कैटेगरी में पाए जाने पर सेवा के लिए अयोग्य घोषित करते हुए सेना से इनवैलिड आउट कर दिया गया।
उन्होंने बताया कि चिकित्सा कारणों से सेवा से हटाए जाने के बावजूद हरपाल सिंह को डिसएबिलिटी इनवैलिड पेंशन नहीं दी गई। उन्होंने इस संबंध में छह जून 2022 को प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) भी भेजा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसी बीच केंद्र सरकार व संबंधित विभागों ने दलील दी कि आवेदक ने 10 वर्ष की न्यूनतम पात्र सेवा पूरी नहीं की है, इसलिए वह इनवैलिड पेंशन का हकदार नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि गैर-पेंशनधारी मामलों में निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद सेवा रिकार्ड नष्ट कर दिए जाते हैं, इसलिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट का दिया हवाला
इसके जवाब में उन्होंने सुखविंदर सिंह बनाम भारत संघ (2014) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए सिद्धांतों का हवाला दिया, जिसके अनुसार भर्ती के समय दर्ज न हुई बीमारी/अयोग्यता को सामान्यतः सेवा के दौरान उत्पन्न माना जाता है, जब तक इसके विपरीत सिद्ध न हो। इसके अलावा एक्स गनर सिनचेट्टी सत्यनारायण व अन्य प्रकरण में प्री-1973 मामलों के लिए सरकार द्वारा दी गई नीति व रियायत का भी उल्लेख किया, जिसके तहत 10 वर्ष की न्यूनतम सेवा से कम अवधि वाले मामलों में भी पात्रता का लाभ दिए जाने का निर्णय लिया गया था।
तीन साल का एरियर देने का आदेश
अधिवक्ता ने बताया कि ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि पेंशन का दावा लगातार होने के बावजूद अत्यधिक देरी होने पर एरियर सीमित किया जा सकता है। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि पूर्व सैनिक को मूल आवेदन दायर करने की तिथि से पूर्व के तीन वर्षों की अवधि के लिए पेंशन का भुगतान किया जाए। उन्होंने बताया कि उन्हें 2020 से पेंशन मिलेगी।
हरपाल सिंह ने जताई खुशी
इस फैसले के बाद हरपाल सिंह ने कहा कि उन्हें देर से ही सही, लेकिन न्याय मिल गया। इस फैसले से वह बेहद खुश हैं। उन्होंने अधिवक्ता पुष्पेंद्र कुमार ढाका का आभार व्यक्त किया है। |
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