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दरभंगा राज का अनोखा इतिहास, बिना युद्ध किए महेश ठाकुर ने स्थापित किया था तिरहुत स्टेट

LHC0088 4 hour(s) ago views 88
  

Bihar history:अंतिम महाधिरानी के निधन के बाद होने लगी दरभंगा राज के इतिहास की चर्चा। फाइल फोटो  



मुकेश कुमार श्रीवास्तव, दरभंगा। Tirhut State history: इतिहास में तलवारों की खनक पर स्थापित राज्य और राजाओं की एक से बढ़कर एक कहानी है, लेकिन मिथिला की धरती पर कुछ ऐसा हुआ जहां युद्ध नहीं, बल्कि विद्वता सत्ता की आधार बनी। यही कारण है कि तिरहुत स्टेट (दरभंगा राज) का इतिहास भारत के राजवंशों में एक अनूठी मिसाल के रूप में जाना जाता है।

महाराजाधिराज स्व. कामेश्वर सिंह की अंतिम और तीसरी पत्नी महाधिरानी काम सुंदरी देवी के निधन के साथ ही एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर वह कौन-सी शक्ति थी, जिसने बिना रक्तपात के एक विशाल राज्य की नींव रख दी? इस प्रश्न का उत्तर हमें ले जाता है 16वीं शताब्दी में, खंडवाल कुल के विद्वान महेश ठाकुर के पास।  
जब अकबर ने तलवार नहीं, विद्वता को चुना

मुगल सम्राट अकबर के दरबार में पहुंचे महेश ठाकुर किसी सेनापति के रूप में नहीं, बल्कि संस्कृत के एक प्रकांड विद्वान के रूप में पहचाने गए। उनके शास्त्रार्थ कौशल की दूर-दूर तक चर्चा थी। दरभंगा राज परिवार पर शोध करने वाली कुमुद सिंह ने बताया कि महेश ठाकुर की प्रशासनिक समझ, शास्त्रीय ज्ञान और व्यवहार कुशलता से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें तिरहुत स्टेट प्रदान किया।

यह भारत के इतिहास में दुर्लभ उदाहरण है, जब किसी ने बिना युद्ध किए राज्य प्राप्त किया।1556 में महेश ठाकुर ने मधुबनी जिले के भौर में राजधानी स्थापित की और 1569 तक शासन किया। यही वह रेखा थी, जिसे न छोटा किया जा सका और न ही कोई उससे लंबी रेखा ही खींच सका।  
उत्तराधिकार की परंपरा और राजधानी का सफर

महेश ठाकुर के बाद गोपाल ठाकुर ने 1569-81 तक शासन किया। इसके बाद वे काशी चले गए। उसके बाद उनके अनुज परमानंद ठाकुर ने सत्ता संभाली। तदोपरांत उनके सौतेले भाई शुभंकर ठाकुर ने तिरहुत स्टेट की बागडोर संभाली।

शुभंकर ठाकुर ने राजधानी को भौर या भौआरा से स्थानांतरित कर शुभंकरपुर नगर बसाया। यह केवल भौगोलिक बदलाव नहीं था, बल्कि प्रशासनिक विस्तार का संकेत था।1617 से 1641 तक पुरुषोत्तम ठाकुर के शासनकाल में राज्य स्थिरता के दौर में रहा।

हालांकि इसके बाद उनके सातवें छोटे भाई सुंदर ठाकुर को जवाबदेही मिली। उन्होंने 1668 तक शासन किया। सातवें राजा महिनाथ ठाकुर हुए। उनको तिरहुत स्टेट का पहला योद्धा राजा माना जाता है, जिन्होंने सिमराओं परगने के अधीश्वर गजसिंह को पराजित कर राज्य की सीमाएं सुरक्षित कीं। उनका शासनकाल 1690 तक रहा।इसके बाद उनके भाई नरपति ठाकुर दस वर्षों तक यानी 1700 तक गद्दी पर रहे।  

  

  
‘ठाकुर’ से ‘सिंह’ बनने तक का सफर

18वीं शताब्दी में सत्ता संभालने वाले राधव सिंह के काल में दरभंगा राज के इतिहास ने एक नया मोड़ लिया। उन्होंने ‘ठाकुर’ के स्थान पर ‘सिंह’ उपाधि धारण की। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीतिक और सैन्य शक्ति के विस्तार का संकेत था। उन्होंने 1739 तक शासन किया।

राधव सिंह ने जातिगत सीमाओं को तोड़ते हुए अपने खवास वीरू कुर्मी को कोशी अंचल की जिम्मेदारी सौंपी। नेपाल तराई के पंचमहल परगने के राजा भूपसिंह को रण में पराजित कर उन्होंने दरभंगा राज की ताकत स्थापित की।  
दरभंगा के राजधानी बनने से मिथिला बनी पहचान

1743 तक राजा रहे विष्णु सिंह के बाद राजा राघव सिंह के दूसरे पुत्र नरेंद्र सिंह को गद्दी मिली। उन्हेंने 1770 तक के कार्यकाल दौरान नरहण राज्य के राजा अजित नारायण की मदद से नवाब अलीवर्दी खान की सेना को युद्ध में पराजित किया।  

उनके बाद पहली बार परिवार की महिला पद्मावती गद्दी पर बैठीं। हालांकि उनका कार्यकाल मात्र आठ साल का रहा। प्रताप सिंह (1778-85) के शासनकाल में राजधानी झंझारपुर पहुंची, लेकिन उनके पुत्र माधव सिंह ने राजधानी को दरभंगा शहर में स्थापित कर दिया।

यही निर्णय दरभंगा को मिथिला की राजनीतिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक राजधानी बनाने वाला साबित हुआ। 1807 तक वे गद्दी पर रहे। लार्ड कार्नवालिस ने उनके शासनकाल में जमीन की दमामी बंदोबस्ती कराई थी।

इसके बाद 1839 तक के राजा रहे छत्र सिंह को नेपाल युद्ध को लेकर 1814-15 में हेस्टिंग्स ने महाराजा की उपाधि दी। इसके बाद यह महाराजा का परिवार बन गया। 1850 तक रुद्र सिंह और 1860 तक महेश्वर सिंह महाराज रहे।

हालांकि, महाराज महेश्वर सिंह की मृत्यु के समय कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह नाबालिग थे। इस कारण दरभंगा राज को कोर्ट आफ वार्ड्स के तहत ले लिया गया। बाद में कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह के बालिग होने पर उन्हें 1880 में सिंहासन सौंप दिया गया, जो 1898 तक बने रहे।   
महाराजाधिराज और आधुनिक मिथिला का सपना

इसके बाद उनके छोटे भाई रामेश्वर सिंह को मौका मिला। जिन्हें 1929 तक के कार्यकाल दौरान ब्रिटिश सरकार की ओर से महाराजाधिराज सहित कई उपाधियां मिलीं। देशभर में मंदिर, भवन और शिक्षण संस्थानों के निर्माण ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई।

उनके निधन के बाद उनके पुत्र कामेश्वर सिंह महाराजाधिराज बने। जिनके कार्यकाल में भारत स्वतंत्र हुआ और जमींदारी प्रथा समाप्त हुई। हालांकि, अपने कार्यकाल में उन्होंने दरभंगा को देश-दुनियां में दर्शनीय बनाने की जी-तोड़ कोशिश की।  

इस तरह से दरभंगा राज परिवार सत्ता संचालन को लेकर पूरी दुनिया में मशहूर हुआ। वे 1947-1952 तक भारत की संविधान सभा के सदस्य रहे ।इसके अलावा 1952 और 1958 में राज्यसभा के सदस्य भी रहे। उनका निधन एक अक्टूबर 1962 को हो गया था।  
उत्तराधिकारी और विरासत

दरभंगा राज के अंतिम महाराज कामेश्वर सिंह को तीन पत्नियों में किसी से भी कोई संतान नहीं हुआ। महाराजाधिराज के भाई राजनगर अंचल के राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के तीन पुत्रों में सबसे छोटे के संतान ही आज उत्तराधिकारी के रूप में हैं।  

बता दें कि राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के बड़े पुत्र राजकुमार जीवेश्वर सिंह को दो पत्नियों से सात पुत्री है। जबकि, मझले पुत्र यज्ञेश्वर सिंह से तीन पुत्र कुमार रत्नेश्वर सिंह, कुमार रश्मेश्वर सिंह और कुमार राजनेश्वर सिंह हुए। सबसे छोटे थे राजकुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र राजेश्वर सिंह और कुमार कपिलेश्वर सिंह हैं, जो राज परिवार के उत्तराधिकारी हैं।
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