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अमेरिका के 50% टैरिफ से मिथिला मखाना एक्सपोर्ट पर संकट, बिहार के व्यापारियों को तलाशना पड़ेगा नया बाजार

cy520520 1 hour(s) ago views 444
  

मिथिला मखाना एक्सपोर्ट



विनय कुमार, दरभंगा। अमेरिका की ओर से आयातित भारतीय उत्पादों पर बढ़ाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ का असर मिथिला मखाना, मधुबनी पेंटिंग व अन्य उत्पादों के व्यापार पर पड़ना तय माना जा रहा है। कारोबारियों व विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिका में मखाना की कीमतें और बढ़ सकती हैं। जिससे वहां के उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।  

बताया जा रहा है कि वर्तमान में अमेरिका में मखाना की कीमत आठ से 10 हजार रुपये प्रति किलोग्राम है। यदि टैरिफ बढ़ने से यह और महंगा हो जाएगा। जिससे निर्यात प्रभावित होगा।  
बड़ी मात्रा में मिथिला का मखाना निर्यात

बताया जाता है कि भारत से अमेरिका को हर साल बड़ी मात्रा में मिथिला का मखाना निर्यात किया जाता है। लेकिन, बढ़ी हुई कीमतों के कारण वहां इसकी मांग घट सकती है। इससे भारतीय निर्यातकों को नये बाजारों की तलाश करनी पड़ेगी।  

वर्तमान में मखाना का निर्यात ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, और अमेरिका आदि देशों में हो रहा है। अमेरिका सबसे बड़ा उपभोक्ता है। इस कारण यहां के अधिकतर कारोबारी अपने उत्पाद को अमेरिका भेजने वाले रूट लाइन पर अधिक काम करते हैं।  
अंतरराष्ट्रीय मांग में वृद्धि हुई

मिथिला मखाना को जीआई टैग मिलने से इसकी अंतरराष्ट्रीय मांग में काफी वृद्धि हुई है। मखाना की कीमतों में काफी उछाल आया। स्थानीय स्तर पर पांच से छह सौ रुपये प्रति किलो बिकने वाले मखाना की कीमत स्थानीय स्तर पर ही बढ़कर 12 से 18 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गईं है। इस कारण से उत्पादन और व्यापार में भी वृद्धि हुई।  

राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. मनोज कुमार का कहना है कि अमेरिका की ओर से भारत पर आयातित उत्पादों पर 25 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाए जाने की घोषणा से सैद्धांतिक रूप से मखाना निर्यात पर असर पड़ सकता है। लेकिन, व्यावहारिक स्तर पर इसका प्रभाव सीमित रहने की संभावना है।  
मखाना उत्पादन का 90 प्रतिशत भारत में

विश्व में मखाना उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत भारत में होता है। और एक स्वास्थ्यवर्धक सुपर फूड के रूप में इसकी वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है।  

मखाना उत्पादन एवं प्रसंस्करण के क्षेत्र मखाना उत्पादन एवं प्रसंस्करण के क्षेत्र में भारत की अग्रणी स्थिति तथा वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में हमारी स्पष्ट पहचान के कारण हमारे देश में उत्पादित मखाना के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार अब भी व्यापक और अवसरों से भरा हुआ है। साथ ही, ब्रिटेन के साथ हालिया मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) और अन्य देशों में मखाना की लोकप्रियता और मांग में वृद्धि संभावित नकारात्मक प्रभावों को संतुलित या समाप्त कर सकती है।  
पांच वर्षों में मखाना का उत्पादन दोगुना

पिछले पांच वर्षों में मखाना का उत्पादन दोगुना हुआ है। वैश्विक स्तर पर इसकी मांग 10 गुना तक बढ़ गई है। मिथिलांचल और कोसी क्षेत्र में करीब 35 हजार एकड़ भूमि पर मखाना की खेती की जाती है। इससे हर साल 65 हजार टन मखाना बीज और 28 हजार टन लावा (तैयार मखाना) का उत्पादन होता है।  

व्यवसायी महेश मुखिया, कंचन कुमारी, राजेश कुमार आदि ने बताया कि इस टैरिफ से अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले उथल पुथल का सीधा असर यहां की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलेगा। लेकिन मखाना उद्योग पर इसका असर नहीं पड़ेगा। किसान अन्य देशों की ओर अपना रुख कर लेंगे।  
ड्राई फूड के कोड पर विदेश भेजा जाता

धर्मेंद्र सहनी, मनोज कुमार, नीतीश कुमार, अशेश्वर मुखिया आदि किसानों ने बताया कि मखाना के बाजार में विस्तार हुआ है। पहले मखाना का निर्यात ड्राई फूड के कोड पर विदेश भेजा जाता था। लेकिन मखाना का अपना कोड मिलने से इसकी सही निर्यात पता चल सकेगा।  

बिहार से पिछले वर्ष लगभग आठ सौ टन मखाने का निर्यात किया गया। लगभग 150 से 200 करोड़ का कारोबार बिहार से होता है। बिहार से मखाना निर्यात का 25 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जाता है। इसके बाद नेपाल 14 प्रतिशत और यूएई आठ प्रतिशत मखाना लेता है।  

अन्य कृषि उत्पादों में बिहार का बासमती चावल खाड़ी देशों को ज्यादा जाता है। आम-लीची निर्यात में भी खाड़ी और यूरोपीय देशों की ज्यादा हिस्सेदारी है। हालांकि इन उत्पादों पर भी असर पड़ना तय है। अब तक अमेरिका में मखाना पर आयात शुल्क 3.5 प्रतिशत थी, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऐलान के मुताबिक बढ़कर 50 प्रतिशत हो गया है।
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