Yajnavalkya Jayanti 2026: महर्षि याज्ञवल्क्य ने कर्म और ज्ञान के बीच संतुलन बताया
डा. चिन्मय पण्ड्या (प्रतिकुलपति, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार)। भारतीय ऋषि परंपरा में महर्षि याज्ञवल्क्य वैदिक ज्ञान, दार्शनिक विचार और आध्यात्मिक साधना के महान गुरु थे। उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों के जीवन को सत्पथ दिखाती हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य की जयंती फाल्गुन शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। यह दिन उनके जीवन और ज्ञान को याद करने का अवसर है। इस साल 22 फरवरी को याज्ञवल्क्य जयंती (Yajnavalkya Jayanti 2026 Date) है।
महर्षि याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेद के प्रवर्तक माने जाते (Maharshi Yajnavalkya Biography) हैं। कहा जाता है कि उन्होंने सूर्यदेव की उपासना करके यह ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने शतपथ ब्राह्मण लिखा, जिसमें यज्ञ और कर्मकांड का विस्तृत विवरण मिलता है।
इसके अलावा उन्होंने बृहदारण्यक उपनिषद में अपने गहरे दार्शनिक विचार दिए। उनका प्रसिद्ध नेति-नेति सिद्धांत—जिसका अर्थ है यह नहीं, यह भी नहीं— ब्रह्म की अनंत और निराकार सत्ता को समझाने का तरीका है। यही सिद्धांत अद्वैत वेदांत की नींव बन गया।
महर्षि याज्ञवल्क्य सिर्फ गुरु ही नहीं, बल्कि बड़े विद्वान और विधि के जानकार भी थे। उनकी रचना ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ धर्म और कानून के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसी पर आधारित ‘मिताक्षरा’ टीका ने हिंदू कानून और न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला। इसलिए वे दर्शन और कानून दोनों में योगदान देने वाले महान ऋषि माने जाते हैं।
उनका जीवन ज्ञान की तरह प्रेरक था। वे देवरात के पुत्र थे और मिथिला के राजा जनक के दरबार में राजऋषि थे। राजा जनक के दरबार में वे विद्वानों से शास्त्रार्थ करते थे और लोगों को सद्ज्ञान की राह दिखाते थे। उनकी पत्नी मैत्रेयी भी विदुषी थीं। उनके साथ हुए संवाद आज भी प्रसिद्ध हैं।
एक बार जब याज्ञवल्क्य (Shukla Yajurveda Compiler) ने गृहत्याग का निश्चय किया, तो मैत्रेयी ने उनसे अमृतत्व का मार्ग पूछा। इस बातचीत में याज्ञवल्क्य ने आत्मा और ब्रह्म के रहस्यों को सरल शब्दों में समझाया। महर्षि याज्ञवल्क्य ने कर्म और ज्ञान के बीच संतुलन बताया।
उन्होंने कहा कि यज्ञ और अनुष्ठान जरूरी हैं, लेकिन अंतिम लक्ष्य आत्मज्ञान और ब्रह्म साक्षात्कार है। उनके विचारों में आंतरिक शुद्धि, सत्य की खोज और आत्मचिंतन पर विशेष जोर है। इस कारण उन्हें ‘ब्रह्मनिष्ठ’ ऋषि कहा जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती पर लोग उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करते हैं। विद्वान उनके ग्रंथों का पाठ और व्याख्यान करते हैं, जिससे नई पीढ़ी वैदिक ज्ञान से जुड़ सके।
आज के समय में जब जीवन में व्यस्तता और तनाव बढ़ गया है, विशेषकर युवाओं के लिए महर्षि याज्ञवल्क्य की शिक्षाएं अत्यंत आवश्यक हैं। उनका नेति-नेति सिद्धांत हमें सीमित सोच से ऊपर उठकर सत्य की खोज करने की प्रेरणा देता है। महर्षि याज्ञवल्क्य के सिद्धांतों पर अखिल विश्व गायत्री परिवार के लाखों अनुयायी आज भी पालन करते हैं।
वे सद्ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अच्छे ग्रंथों और साहित्य का नियमित अध्ययन करते हैं। इसके साथ ही यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर समाज और आत्मा की शुद्धि का प्रयास करते हैं। यह परंपरा न केवल व्यक्तिगत जीवन को संतुलित बनाती है, बल्कि समाज में नैतिकता, संयम और भाईचारे को भी बढ़ावा देती है।
आज की युवा पीढ़ी, जो तकनीकी और भौतिक उन्नति में बहुत आगे बढ़ चुकी है, महर्षि याज्ञवल्क्य की शिक्षाओं से सीख सकती है कि सच्चा विकास केवल बाहरी उन्नति में नहीं, बल्कि आत्मा की उन्नति में भी है। उनका जीवन हमें यह याद दिलाता है कि ज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य पूर्ण और संतुलित जीवन जी सकता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती हमें आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान और विवेक का महत्व भी बताती है। उनके विचार और आदर्श आज भी समाज को सही दिशा दिखाते हैं और आने वाली पीढिय़ों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत बने रहेंगे।
यह भी पढ़ें- Jeevan Darshan: उर्मिला से मंदोदरी तक, क्यों इन पात्रों ने चुनी खामोशी की राह? जानें इसके पीछे का बड़ा रहस्य
यह भी पढ़ें- Jeevan Darshan: 2026 में अपनी लाइफ को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने के लिए अपनाएं ये जादुई टिप्स |
|