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26 साल बाद चौकीदार को मिली न्याय, हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के फैसले को किया रद; अब ब्याज सहित मिलेंगे सभी लाभ

Chikheang 1 hour(s) ago views 488
  

26 साल बाद चौकीदार को मिली न्याय। सांकेतिक फोटो



राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने लगभग 26 वर्ष पुराने सेवा विवाद में एक फैसला सुनाते हुए हरियाणा सरकार के उस आदेश को रद कर दिया, जिसके तहत एक कर्मचारी की नियमित सेवा समाप्त कर दी गई थी।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक बार सरकारी नीति के तहत नियमित किए गए कर्मचारी की सेवा बाद में तकनीकी आधार पर समाप्त नहीं की जा सकती और उसे निरंतर सेवा मानते हुए सभी सेवा लाभ देने होंगे।

यह फैसला जस्टिस संदीप मौदगिल ने यमुनानगर निवासी श्री पाल सिंह की याचिका पर सुनाया। सिंह ने माली-कम-चौकीदार पद पर अपनी सेवाओं को पुन नियमित करने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसकी नियुक्ति वर्ष 1991 में रोजगार कार्यालय के माध्यम से विधिवत हुई थी और राज्य सरकार की 1996 की नियमितीकरण नीति के तहत उसे 1 फरवरी 1996 से नियमित भी कर दिया गया था।
सरकार ने दी ये दलील

नियमितीकरण के बाद उसे वेतनमान, वार्षिक वेतनवृद्धि और जीपीएफ नंबर सहित सभी लाभ दिए गए, लेकिन 1999 में यह कहते हुए उसकी सेवा फिर से अनियमित कर दी गई कि वह पंचायत समिति का कर्मचारी है, राज्य सरकार का नहीं।

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सरकार की ओर से दलील दी गई कि कर्मचारी की मूल नियुक्ति पंचायत समिति द्वारा की गई थी, इसलिए उसे सरकारी कर्मचारी नहीं माना जा सकता और नियमितीकरण गलती से हुआ था।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि पंचायत समिति एक वैधानिक संस्था है, जो सरकारी नियंत्रण और वित्तीय सहायता के तहत कार्य करती है, इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद-12 के तहत “राज्य” का अंग माना जाएगा।
समानता के अधिकार का उल्लंघन

अदालत ने यह भी कहा कि जब राज्य स्वयं किसी कर्मचारी को नीति के तहत नियमित कर वर्षों तक नियमित कर्मचारी की तरह सभी लाभ देता है, तो बाद में उसी आधार पर नियमितीकरण वापस लेना मनमाना और असंवैधानिक है।

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इससे कर्मचारी में वैध अपेक्षा उत्पन्न हो जाती है कि उसकी सेवा स्थिति स्थिर रहेगी। निर्णय में यह भी उल्लेख किया गया कि समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारियों को सेवा में बनाए रखा गया, जबकि केवल याचिकाकर्ता को हटाया गया, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

अंतत हाईकोर्ट ने 8 अगस्त 1999 के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि कर्मचारी को 1 फरवरी 1996 से निरंतर नियमित सेवा में माना जाए और उसे वेतन निर्धारण, वेतनवृद्धि, पेंशन सहित सभी लाभ दिए जाएं। अदालत ने बकाया राशि का भुगतान 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित करने का भी आदेश दिया।
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