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पूर्वोत्तर के लोगों पर नस्लीय हमलों से जुड़ी अर्जी पर हस्तक्षेप से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- हिंसा को सख्ती से रोकें

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पूर्वोत्तर के लोगों पर नस्लीय हमलों से जुड़ी अर्जी पर हस्तक्षेप से सुप्रीम कोर्ट का इनकार (फोटो- एएनआई)



पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूर्वोत्तर और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों से नस्लीय भेदभाव और हिंसा के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर सीधे विचार करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की हिंसा से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी नस्ल, क्षेत्र, लिंग और जाति के आधार पर व्यक्तियों की पहचान करना एक \“\“प्रतिगामी मार्ग\“\“ पर चलने के समान होगा।

पीठ ने कहा, \“\“\“अपराध केवल अपराध होता है और इससे सख्ती से निपटा जाना चाहिए।\“\“\“ सुप्रीम कोर्ट ने अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को इस याचिका पर विचार करने और इसे उचित प्राधिकरण के पास भेजने का निर्देश दिया है।

यह याचिका दिल्ली के वकील अनूप प्रकाश अवस्थी द्वारा त्रिपुरा के 24 वर्षीय एमबीए छात्र एंजेल चकमा की नृशंस हत्या के बाद दायर की गई थी। चकमा की दिसंबर 2025 में देहरादून के सेलाकुई इलाके में नस्लीय हमले के दौरान हत्या कर दी गई थी।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संसद में इस मुद्दे को उठाने के बावजूद हेट क्राइम से निपटने के लिए कोई विशेष एजेंसी नहीं बनाई गई है।

कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को छूट दी कि वह अपनी याचिका की साफ्ट कापी अटार्नी जनरल कार्यालय को सौंपें, ताकि वे इस पर आवश्यक कार्रवाई कर सकें। याचिका में पूर्वोत्तर और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ हो रहे भेदभाव को \“\“संवैधानिक विफलता\“\“ बताया गया था।
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