सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव से पहले राज्यों की ओर से दी जाने वाली “फ्री बीज” यानी फ्री सुविधाओं पर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने पूछा कि अगर सरकारें मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली और सीधे खाते में पैसा देती रहेंगी, तो विकास के लिए पैसा कहां से आएगा? यह मामला तब उठा जब चुनावी राज्य तमिलनाडु की पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ने प्रस्ताव रखा कि वह सभी उपभोक्ताओं को, उनकी आर्थिक स्थिति चाहे जो भी हो, मुफ्त बिजली देगी। इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने कहा कि पूरे देश में कैसी संस्कृति बनाई जा रही है? अगर सुबह से मुफ्त खाना, फिर मुफ्त साइकिल, फिर मुफ्त बिजली और अब सीधे खाते में कैश ट्रांसफर दिया जाएगा, तो लोग काम क्यों करेंगे?
उन्होंने कहा कि जो लोग सच में गरीब हैं और बिल नहीं दे सकते, उनकी मदद करना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन जो लोग पैसे देने में सक्षम हैं, उन्हें भी बिना फर्क किए मुफ्त सुविधाएं देना सही नहीं है।
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मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कई बच्चे पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाते, वहां सरकार को मदद करनी चाहिए। लेकिन अगर अमीर लोगों तक भी मुफ्त सुविधाएं पहुंच रही हैं, तो क्या अब राज्यों को अपनी नीतियों पर दोबारा विचार नहीं करना चाहिए?
कमाई का 25% हिस्सा विकास में लगाए सरकार
कोर्ट ने कहा कि हर राज्य को अपनी कमाई का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा विकास कार्यों- जैसे सड़क, अस्पताल, स्कूल और कॉलेज—पर खर्च करना चाहिए।
कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से साफ पूछा कि इन वादों के लिए पैसा कहां से आएगा? “ऐसी नीतियों के कारण विकास के लिए एक पैसा भी नहीं बचता,” कोर्ट ने कहा। साथ ही यह भी जोड़ा कि यह समस्या सिर्फ एक राज्य की नहीं, बल्कि लगभग सभी राज्यों की है।
पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अगर कोई राज्य मुफ्त योजनाएं देना चाहता है, तो उसे बजट में साफ दिखाना चाहिए कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा और वह इसे कैसे खर्च करेगा।
तमिलनाडु सरकार को कोर्ट ने दिया नोटिस
कोर्ट यह सुनवाई तमिलनाडु की बिजली कंपनी की उस याचिका पर कर रही थी, जिसमें 2024 के बिजली संशोधन नियमों के एक प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ बताया गया है।
साथ ही कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि वह मुफ्त बिजली योजना के लिए फंड की व्यवस्था कैसे करेगी। केंद्र सरकार को भी नोटिस भेजा गया है।
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