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गुरुग्राम के इन फ्लैट्स को नहीं मिलेगा बिजली कनेक्शन, कोर्ट का बड़ा फैसला

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बादशाहपुर की शीतला कॉलोनी में एक अवैध फ्लैट को बिजली कनेक्शन देने से इनकार कर दिया गया है। इमेज एआई



संवाददाता, बादशाहपुर। एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज पुनीत सहगल की कोर्ट ने अवैध कंस्ट्रक्शन वाले एक फ्लैट को बिजली कनेक्शन देने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी। पिटीशनर मुकेश कुमारी ने अपने वकील क्षितिज मेहता के ज़रिए सिविल जज के फैसले को सेशंस कोर्ट में चुनौती दी।

इस केस में दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम के सिटी डिवीजन के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर और न्यू पालम विहार के सब-डिवीजनल इंजीनियर को पार्टी बनाया गया था।

यह केस दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम के खिलाफ फाइल किया गया था। प्लेनटिफ मुकेश कुमारी ने 27 अप्रैल, 2025 को अपने फ्लैट के लिए डोमेस्टिक बिजली कनेक्शन के लिए अप्लाई किया था।

उन्होंने आरोप लगाया कि सभी ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स जमा करने के बावजूद, बिना किसी सही वजह के उनकी एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दी गई, जबकि आस-पास के दूसरे घरों को पहले ही बिजली कनेक्शन जारी कर दिए गए थे।
इंटरिम ऑर्डर में कनेक्शन देने का ऑर्डर

ट्रायल कोर्ट ने शुरू में एक इंटरिम ऑर्डर में कनेक्शन देने का ऑर्डर दिया था। बाद में, सिविल जज संतोष की कोर्ट ने 3 नवंबर, 2025 को एप्लीकेशन खारिज कर दी। इस ऑर्डर के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अपील फाइल की गई थी।

अपील में कहा गया कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 के सेक्शन 43 के तहत, इलेक्ट्रिसिटी डिपार्टमेंट कनेक्शन देने के लिए मजबूर है। यह उसके जीवन और आजादी के अधिकार से भी जुड़ा है।

इलेक्ट्रिसिटी कॉर्पोरेशन की तरफ से वकील विवेक वर्मा ने कहा कि जिस बिल्डिंग में शिकायत करने वाली रहती है, वह हरियाणा बिल्डिंग कोड 2017 के नियमों का उल्लंघन करते हुए बिना इजाज़त के बनाई गई थी।

कॉर्पोरेशन को गुरुग्राम नगर निगम और दूसरे डिपार्टमेंट से ऐसे गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन को नए कनेक्शन जारी न करने के निर्देश मिले हैं। यह भी बताया गया कि बिल्डिंग में इजाज़त से ज़्यादा फ्लैट हैं और उसके पास मंज़ूर नक्शा या ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट नहीं है।
फरीदाबाद कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन को बचाया नहीं जा सकता, और ऐसी बिल्डिंग को बिजली जैसी बेसिक सर्विस भी तब तक नहीं दी जा सकती जब तक वैलिड इजाजत और ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट न दिखाया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती कि आस-पास के दूसरे लोगों को पहले ही कनेक्शन मिल चुके हैं, क्योंकि कानून गलती नहीं दोहरा सकता। कोर्ट ने कहा कि कोई भी ज्यूडिशियल सहानुभूति जो गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन को बढ़ावा देती है, वह शहर की प्लानिंग, ट्रैफिक, पानी और सीवरेज सिस्टम पर बुरा असर डालती है।

कोर्ट ने अपील खारिज कर दी, ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और पावर कॉर्पोरेशन के फैसले को कानूनी तौर पर सही माना।

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