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सोनभद्र के वनवासी बनेंगे टूरिस्ट गाइड, रोजगार व संस्कृति को मिलेगा नया जीवन

LHC0088 2025-11-16 11:36:29 views 718
  



प्रशांत शुक्ल, साेनभद्र। जनपद के जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले युवाओं के लिए प्रदेश सरकार अब एक ऐसी पहल शुरू की है, जो न सिर्फ आदिवासी समुदाय की आर्थिक स्थिति सुधारने में सहायक होगी बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान को भी एक नया आयाम देगी। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

जिले में अब आदिवासी युवाओं को टूरिस्ट गाइड के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा। जिससे क्षेत्र में आने वाले पर्यटकों को प्राकृतिक सौंदर्य, वन संपदा और जनजातीय संस्कृति की विशेषज्ञ जानकारी स्थानीय लोग ही देंगे। पर्यटन विभाग इस पहल पर कार्य करेगा।

सोनभद्र के घने जंगल, झरने, पहाड़, आदिवासी परंपरा और समृद्ध जनजातीय जीवन हमेशा से पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है, लेकिन अब तक पर्यटन सेवाओं में स्थानीय लोगों की सहभागिता नगण्य थी। अब प्रशिक्षण पाने के बाद आदिवासी युवा न सिर्फ मार्गदर्शन करेंगे, बल्कि जंगल सफारी, सांस्कृतिक टूर और साहसिक पर्यटन की गतिविधियों से भी आय प्राप्त करेंगे।

अधिकारियों का कहना है कि इससे युवाओं को उनके ही क्षेत्र में रोजगार मिलेगा और पलायन भी रुकेगा। पर्यटन, वन उपज और सांस्कृतिक संरक्षण तीनों रास्तों से विकास का यह माडल आने वाले समय में सोनभद्र व मीरजापुर मंडल के जनजातीय क्षेत्रों की तस्वीर बदल सकता है।

वन उपज को लेकर पहल, खुलेंगे आर्थिक उन्नति के द्वार

सिर्फ पर्यटन ही नहीं, सरकार वन ऊपज के दोहन और संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रही है। महुआ, तेंदूपत्ता, शहद, लाख, हर्रा-बैहेड़ा और बांस जैसे उत्पाद आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। अब इन्हें संगरहित करने के लिए वनवासियों को किसी प्रकार की अनुमति नहीं लेनी होगी।

प्रदेश सरकार ने आदिवासी अंचल के लोगों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ करने के लिए वन उपज संग्रहित करने व उसके बिक्री के लिए उन्हे छूट दी है। इससे बिचौलियों पर निर्भरता घटेगी और आमदनी में 25 से 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
मंडल में बनेगा दूसरा जनजाति संग्रहालय

जनजातीय संस्कृति, इतिहास और जीवनशैली को सुरक्षित रखने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। मंडल में जल्द ही जनजाति संग्रहालय स्थापित किया जाएगा।

यह संग्रहालय विंध्य क्षेत्र की कोल, गोंड, खरवार, बैगा और अन्य जनजातियों की परंपराओं, लोकगीत, वाद्य यंत्रों, हथकरघा कला, आहार संस्कृति और जीवनशैली को प्रदर्शित करेगा। संग्रहालय न सिर्फ शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा, बल्कि बच्चों और नई पीढ़ी के लिए अपनी मूल पहचान से जुड़ाव का माध्यम भी बनेगा।
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