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जमुई में 50 लाख की लागत से बने प्लांट के बंद होने का खतरा, CM नीतीश ने किया था उद्घाटन

Chikheang 3 hour(s) ago views 974
  

जमुई जिले का पहला गोबर गैस प्लांट। फोटो जागरण



संवाद सूत्र, लक्ष्मीपुर(जमुई)। जिले का पहला गोबर गैस प्लांट प्रखंड के हरला पंचायत अंतर्गत दोनहा गांव में स्थापित किया गया था। बीते वर्ष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समाधान यात्रा के दौरान जमुई आगमन के क्रम में रिमोट के माध्यम से इस जनकल्याणकारी योजना का उद्घाटन किया था।

करीब 49 लाख 95 हजार रुपये की लागत से बने इस प्लांट को ग्रामीण विकास की दिशा में एक बड़ी पहल माना जा रहा था, लेकिन निर्माण के बाद से ही यह लगातार विवादों और अव्यवस्थाओं में घिरा रहा है।

वर्तमान स्थिति यह है कि गोबर गैस प्लांट के संचालन की जिम्मेदारी संभाल रही एजेंसी इसे सुचारू रूप से चलाने में विफल साबित हो रही है। परिणामस्वरूप प्लांट बंद होने के कगार पर पहुंच गया है।
जीविका दीदीयों को सौंपने की तैयारी

अब जिला प्रशासन इस प्लांट के संचालन की जिम्मेदारी गांव की जीविका दीदियों को सौंपने की तैयारी में जुट गया है। इसे लेकर जल्द ही स्थानीय ग्रामीणों एवं जीविका समूह की महिलाओं की उपस्थिति में बैठक आयोजित कर जिम्मेदारी सौंपने की घोषणा किए जाने की संभावना है।

पूर्व में एजेंसी के अधिकारियों द्वारा दोनहा गांव की कुछ महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया था, जिसमें गोवर्धन योजना से मिलने वाले लाभों की जानकारी दी गई। हालांकि, हकीकत यह है कि जिन महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया, उनके घरों में अब तक गैस कनेक्शन और आपूर्ति के लिए पाइप लाइन तक नहीं बिछाई गई है।

योजना के तहत इस प्लांट से गांव के लगभग 50 घरों में गैस आपूर्ति की जानी थी। हालांकि, पाइप लाइन तो करीब 50 घरों तक पहुंचा दी गई है, लेकिन आज तक गैस आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी है।

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि गोबर की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने के कारण प्लांट सही ढंग से संचालित नहीं हो पा रहा है। वहीं दूसरी ओर, स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने तय दर पर कई ट्रेलर गोबर प्लांट को उपलब्ध कराया है, लेकिन निर्माण के एक वर्ष बीत जाने के बावजूद अब तक गोबर की कीमत का भुगतान नहीं किया गया है। इससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर भुगतान और समुचित व्यवस्था की जाती तो यह प्लांट न सिर्फ गांव की महिलाओं के लिए राहत साबित होता, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा का बेहतर उदाहरण भी बन सकता था।

अब देखना यह है कि प्रशासन द्वारा जीविका दीदियों को जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद यह महत्वाकांक्षी योजना धरातल पर कितनी सफल हो पाती है।
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