'हम जानते हैं कि इस देश में महापुरुषों को जाति, धर्म, भाषा इत्यादि के आधार पर बांटने का खेल पिछले तीस-चालीस साल से चल रहा है। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और बढ़ी है। क्या महात्मा गांधी और सरदार पटेल सिर्फ गुजराती थे और रवीन्द्रनाथ ठाकुर और नेताजी बंगाली?
क्या शिवाजी सिर्फ मराठों के वरेण्य थे या फिर कुर्मी क्षत्रिय समाज के गौरव? क्या दुर्गावती सिर्फ गोंडों की रानी थीं और अवंतीबाई लोधियों की? क्या चंद्रशेखर आजाद सिर्फ कान्यकुब्ज थे और भगत सिंह सरदार?'
'हम तो अपने बचपन से भगतसिंह की हैट लगी प्रतिमा देखते आए हैं। लेकिन हमारे लिए यह उतना महत्वपूर्ण नहीं था कि वे किस प्रदेश, किस समाज, किस जाति के थे और वे क्या पहनते थे। आज जिन्होंने भगत सिंह का सिर काटा है, काश वे भगत सिंह का लिखा हुआ पढ़ पाते, उनके विचारों को समझ पाते, उनसे कुछ प्रेरणा लेते तो उन्हें इस अपराध का भागी न बनना पड़ता।'
(देशबन्धु में 23 जुलाई 2014 को प्रकाशित)
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DB Desk
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