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IIT-AIIMS की बड़ी खोज, एक स्मार्ट कैप्सूल निगलते ही मिल जाएगा हर सुराग; आंत की बीमारियों की जांच होगी आसान

Chikheang 2025-12-17 03:37:06 views 1248
  



अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। आईआईटी व एम्स दिल्ली के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसी निगलने योग्य कैप्सूल आकार की माइक्रोडिवाइस विकसित की है, जो सीधे मानव शरीर की छोटी आंत से बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों के नमूने एकत्र करने में सक्षम है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

इसे मानव माइक्रोबायोम को समझने और आंतों से जुड़ी बीमारियों के आरंभिक निदान की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। कैप्सूल के आकार की इस माइक्रोडिवाइस को मरीज आसानी से निगल सकता है। यह पेट के अम्लीय वातावरण में भी सुरक्षित रहती है।

छोटी आंत में पहुंचने पर यह सक्रिय होकर वहां मौजूद बैक्टीरिया व जैविक तत्वों का नमूना अपने भीतर संग्रहित कर लेती है। नमूना लेने के बाद यह खुद को सील कर लेती है, ताकि आंत के अलग-अलग हिस्सों के सूक्ष्मजीव आपस में न मिलें। विशेषज्ञों के अनुसार यह उपलब्धि आंतों, मेटाबाॅलिज्म और पोषण से जुड़ी बीमारियों की पहचान में मददगार होगी।

आईआईटी दिल्ली की मेडिकल माइक्रोडिवाइस एंड मेडिसिन प्रयोगशाला के प्रधान वैज्ञानिक प्रोफेसर सर्वेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि मानव शरीर के भीतर सूक्ष्मजीवों की एक विशाल दुनिया मौजूद है, जो पाचन, प्रतिरक्षा और कई बीमारियों में अहम भूमिका निभाती है।

कहा कि अब तक छोटी आंत के माइक्रोबायोम का अध्ययन करना कठिन था, क्योंकि इसके लिए एंडोस्कोपी जैसी जटिल प्रक्रियाओं या फिर मल के नमूनों पर निर्भर रहना पड़ता था, जो सटीक जानकारी नहीं देते थे। नई माइक्रोडिवाइस इस कमी को दूर करेगी।

एम्स नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलाजी और ह्यूमन न्यूट्रिशन यूनिट के को-सीनियर वैज्ञानिक डाॅ. समग्र अग्रवाल ने बताया कि छोटी आंत स्वास्थ्य और बीमारी दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस डिवाइस के आ जाने से छोटी आंत में मौजूद माइक्रोब्स और रासायनिक तत्वों की सही जानकारी मिल सकेगी, जिससे बीमारियों का जल्दी पता लगाना, पुरानी बीमारियों की निगरानी करना और पहले से अधिक असरदार उपचार विकसित करना संभव होगा।

बताया कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) वित्तपोषित यह उपलब्धि अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्माल में ‘ए स्माल पिल-लाइक इन्जेस्टिबल माइक्रोडिवाइस फार साइट-स्पेसिफिक माइक्रोबायोम सैंपलिंग इन द अपर जीआ ट्रैक्ट’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। अब आवश्यक नियामक मंजूरियों के बाद इसे क्लिनिकल उपयोग में लाने की तैयारी है, जिससे आने वाले समय में मरीजों को इसका सीधा लाभ मिल सकेगा।
कैसे आती है बाहर

छोटी आंत में पाचन क्रिया के दौरान भोजन आगे बढ़ाने के लिए प्राकृतिक लहरनुमा गति ‘पेरिस्टाल्टिक मूवमेंट’ इसे धीरे-धीरे आगे की ओर धकेलता है। जिससे यह छोटी आंत से बड़ी आंत में पहुंचती है।

पाचन तंत्र के सामान्य मार्ग से आगे बढ़ते हुए यह डिवाइस मल त्याग की सामान्य प्रक्रिया से बिना किसी दर्द या अतिरिक्त बल के शरीर से बाहर आ जाती है। इसका डिजाइन इस बात को ध्यान में रखकर किया गया है कि इसे बाहर आने के बाद आसानी से पहचाना और निकाला जा सके।
नियंत्रित रिकवरी

मरीज को पहले से बताया जाता है कि 24–72 घंटे के भीतर मल त्याग के दौरान यह निकलेगी। साथ ही मल को एक विशेष स्टूल-कलेक्शन किट में एकत्र किया जाता है। इससे डिवाइस मल में बहने के बजाय उसी कंटेनर में रह जाती है। उसकी सतह चिकनी और अलग रंग अलग संरचना होती है जो कि आसानी से पहचानी जा सकती है।

वहीं, डिवाइस का आकार, सीलिंग व संरचना को इस तरह डिजाइन है कि उसके न मिलने की आशंका बेहद कम है।सैंपल सुरक्षित रहता है और बहने की आशंका नहीं के बराबर होती।भविष्य में इसके उन्नत संस्करणों में मैग्नेटिक या ट्रैकिंग फीचर जोड़ने पर भी काम किया जा रहा है।
पहले क्या थी व्यवस्था ?

विशेषज्ञों के अनुसार पहले के सभी तरीकों में या तो बहुत कम सटीकता थी या वे बहुत ज्यादा दर्दनाक और जोखिम भरे होते थे। इससे छोटी आंत के माइक्रोबायोम का अध्ययन बहुत सीमित और महंगा था।



  • पहले माइक्रोबायोम (बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों) के सीधे सैंपल की आसान व्यवस्था नहीं
  • मल सैंपल आम व आसान तरीका। पर, यह बड़ी आंत के बैक्टीरिया को ही दर्शाता, छोटी आंत के बैक्टीरिया बहुत कम होते, इसलिए छोटी आंत के वास्तविक माइक्रोबायोम की पूरी व सही तस्वीर नहीं मिलती। इसके अलावा इंडोस्कोपी के जरिये भी यह प्रक्रिया होती थीलजो काफी दर्दनाक होती थी।


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