अनुष्का को विभागीय स्तर पर बुनियादी खेल संसाधन तक नियमित नहीं मिल पा रहा।
आमोद कुमार साहू, (ओरमांझी) रांची। झारखंड की खेल प्रतिभाएं अक्सर अभावों में चमकती हैं, लेकिन जब देश का सर्वोच्च सम्मान पाने वाली बेटी को बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़े, तो राज्य की खेल नीति पर सवाल उठना लाजिमी है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों \“प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार\“ (बाल वीर पुरस्कार) से सम्मानित 14 वर्षीया अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर अनुष्का कुमारी आज जूते और साइकिल जैसी छोटी चीजों के लिए तरस रही हैं।
सिस्टम की उदासीनता: साल में सिर्फ एक बार किट
हजारीबाग स्थित आवासीय बालिका फुटबॉल प्रशिक्षण केंद्र में अभ्यास कर रही अनुष्का की कहानी झारखंड की खेल व्यवस्था की कड़वी हकीकत है। केंद्र की वार्डन सुशीला साहू के अनुसार, खेल विभाग साल में सिर्फ एक बार ट्रैकसूट, टी-शर्ट और जूते देता है।
मैदान पर पसीना बहाने वाले खिलाड़ियों के जूते अगर बीच साल में फट जाएं, तो विभाग के पास उन्हें दूसरा जोड़ा देने का कोई प्रावधान नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर अनुष्का के लिए अपने खर्च पर नए प्रोफेशनल बूट्स लेना एक बड़ी चुनौती बन गई है।
चीन जाने की तैयारी, पर घर में तंगी का साया
अनुष्का कुमारी भारतीय अंडर-17 फुटबॉल टीम की एक चमकती सितारा हैं। भूटान और नेपाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में \“बेस्ट स्कोरर\“ और \“मैन ऑफ द सीरीज\“ रहने के बाद उनका चयन इस वर्ष मार्च में चीन में होने वालीएशिया फुटबॉल प्रतियोगिता के लिए हुआ है।
इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद, अनुष्का के पास घर से मुख्य सड़क तक जाने के लिए एक साइकिल तक नहीं है। स्कूल की फीस और हॉस्टल के खर्च को मिलाकर हर महीने होने वाला लगभग 5,000 रुपये का खर्च उनकी मां रीता देवी के लिए पहाड़ जैसा है, जो मजदूरी करके अपनी बेटी के सपनों को पाल रही हैं।
जब जनप्रतिनिधियों के सामने छलक पड़ा दर्द
हाल ही में जब जिला परिषद सदस्य संजय कुमार और समाजसेवी जयगोविंद साहू अनुष्का को सम्मानित करने पहुंचे, तो इस अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ने अपनी पीड़ा साझा की। अनुष्का ने बताया कि अभ्यास के दौरान जूते फट जाना उसके लिए सबसे बड़ा डर है क्योंकि दूसरा जोड़ा खरीदने की हैसियत परिवार की नहीं है।
उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने उसे जूता और साइकिल जल्द उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है और कहा कि ऐसी प्रतिभाएं देश की धरोहर हैं, जिन्हें संबल देना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।
बड़ा सवाल: क्या सिर्फ पुरस्कार देना काफी है?
एक खिलाड़ी जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराने की तैयारी कर रही है, वह अगर ₹5000 के मासिक खर्च और फटे जूतों से जूझ रही है, तो यह खेल विभाग की कार्यशैली पर गहरा धब्बा है। जब जिला खेल पदाधिकारी से इस संबंध में संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। |