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स्नान-ध्यान का पवित्र माघ मास आज से आरंभ, पौष पूर्णिमा पर आस्था ने लगाई पुण्य की डुबकी

deltin33 2026-1-4 09:27:43 views 425
  

माघ मास में संयमित जीवन नियमित स्नान, बनाता सुखी, शांत व सामर्थ्यवान। जागरण  



जागरण संवाददाता, वाराणसी। स्नान-ध्यान कर तपश्चर्यापूर्वक मासपर्यंत रहते हुए जीवन को आध्यात्मिक शांति व शक्ति से परिपूर्ण करने का पवित्र माघ मास रविवार से आरंभ हो रहा है। धर्मशास्त्रों में इस मास में नित्य स्नान का विधान वर्णित है। कहा गया है कि पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरंभ कर माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी अथवा पूर्णिमापर्यंत प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करने से मनुष्य को अतिविशिष्ट फल की प्राप्ति होती है।

विशेष रूप से काशी में गंगा व प्रयागराज में गंगा या त्रिवेणी संगम में स्नान को अत्यंत फलदायी बताया गया है। इसके निमित्त पौष पूर्णिमा के दिन शनिवार को इन स्थानों पर श्रद्धालुओं की काफी भीड़ उमड़ी और सबने पुण्य सलिला में आस्था की डुुबकी लगाकर आरोग्य, सुख व कल्याण की कामना की। ठंड की परवाह न करते हुए भोर से ही गंगा घाटों पर काफी संख्या में लोग उमड़ पड़े थे।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष व श्रीकाशी विद्वत परिषद के अखिल भारतीय संगठन मंत्री प्रो. विनय कुमार पांडेय बताते हैं कि धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास में नियम पूर्वक स्नान व संयमित जीवन, मानव को सहज, सरल, सुखमय एवं आध्यात्मिक चेतना से संपन्न बनाते हुए जीवन को सर्वविध समृद्धि प्रदान करते हैं तथा इस लोक के लौकिक सुखों के साथ साथ पारलौकिक सुखों काे भी मानव जीवन में प्राप्त कराते हैं।

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इस मास में त्रिकाल स्नान कर, संयम नियम से रहते हुए भूमि पर शयन करना चाहिए तथा सभी भौतिक भोग पदार्थों का त्याग कर, भगवान विष्णु की त्रिकाल उपासना करनी चाहिए इससे मनुष्य जितेंद्रिय होता है तथा विद्या में दक्षता को प्राप्त करता है।  

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय में सिद्धांत दर्शन विभाग के अध्यक्ष प्रो. चंद्रशेखर पांडेय कहतेे हैं कि हमारे मनीषियों ने सभी व्रत-पर्वों को किसी एक वैज्ञानिक-सामाजिक उद्देश्य से बनाया है। माघ स्नान का वैज्ञानिक महत्व देखें तो इस मास में तपश्चर्या पूर्ण जीवन, कल्पवास, पवित्र गंगा में त्रिकाल स्नान-संध्या आदि का विधान मनुष्य में प्रतिरक्षा प्रणाली काे मजबूत बनाता है।

शिशिर ऋतु में धर्मावलंबी अपने शरीर, मन को इस प्रकार साधते हैं कि वे प्रत्येक परिस्थिति के अनुकूल स्वयं को विकसित कर सकें। यह अभ्यास कम संसाधनों में भी जीवन सुखमय व निरोगी बनाने का उपक्रम है।
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