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नोवामुंडी और जोड़ा Mines पर संकट के बादल, Tata steel ने सात समंदर पार सुरक्षित किया कच्चा माल

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फाइल फोटो।



जासं, जमशेदपुर । टाटा स्टील ने वर्ष 2030 में कच्चा माल यानी आयरन ओर की आपूर्ति में आने वाले संभावित संकट को देखते हुए अभी से सुरक्षा कवच तैयार करना शुरू कर दिया है। भारत में कंपनी की अपनी खदानों की लीज अवधि 2030 में समाप्त होने जा रही है।

भविष्य के इस बड़े जोखिम को भांपते हुए टाटा स्टील ने पहली बार अपनी कनाडाई कंपनी से आयरन ओर का आयात शुरू किया है। इसे एक रणनीतिक ट्रायल के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि आने वाले वर्षों में अगर भारतीय खदानों के नवीनीकरण में कोई बाधा आए, तो जमशेदपुर और अन्य प्लांट में इस्पात का उत्पादन न रुके।  
वर्ष 2030 की डेडलाइन और खदानों का गणित

इस पूरी कवायद की मुख्य वजह भारत सरकार का खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम है। इसके तहत टाटा स्टील जैसी कंपनियों को मिली कैप्टिव खदानों (जो खदानें कंपनी अपने इस्तेमाल के लिए चलाती है) की लीज 31 मार्च 2030 को समाप्त हो जाएगी।

इसमें टाटा स्टील की जीवनरेखा मानी जाने वाली कई बड़ी खदानें शामिल हैं। झारखंड स्थित ऐतिहासिक नोवामुंडी खदान के अलावा ओडिशा की जोडा ईस्ट, काटामटी और खोंडबोंड जैसी महत्वपूर्ण खदानों की अवधि इसी तारीख को खत्म हो रही है।

इसके बाद इन खदानों की दोबारा नीलामी की प्रक्रिया होगी। अगर उस समय लीज रिन्यूअल में देरी हुई या खदानें हाथ से निकल गईं, तो कंपनी के सामने कच्चे माल का भारी संकट खड़ा हो सकता है।
कनाडा से मिली उम्मीद की नई किरण

इसी अनिश्चितता से निपटने के लिए कंपनी प्रबंधन ने प्लान-बी पर काम शुरू कर दिया है। टाटा स्टील ने अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी टाटा स्टील मिनरल्स कनाडा से आयरन ओर की एक बड़ी खेप बुक की है। कनाडा से आने वाला यह लौह अयस्क बेहद उच्च गुणवत्ता का है।

इसमें लोहे की मात्रा लगभग 64 प्रतिशत है, जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से इस्पात निर्माण के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। कंपनी का उद्देश्य यह परखना है कि यदि घरेलू आपूर्ति चेन टूटती है, तो सात समंदर पार से कच्चा माल लाना कितना व्यावहारिक और किफायती रहेगा।
बढ़ती मांग और आत्मनिर्भरता की चुनौती

वर्तमान स्थिति की बात करें तो टाटा स्टील कच्चे माल के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर है। कंपनी अपनी भारतीय खदानों से सालाना लगभग चार करोड़ टन आयरन ओर निकालती है, जो उसकी मौजूदा जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी है।

वहीं, कनाडा स्थित खदानों की क्षमता करीब 30 लाख टन सालाना है। चूंकि टाटा स्टील अपने प्लांट का विस्तार कर रही है, इसलिए अनुमान है कि वर्ष 2031 तक कंपनी को सालाना 4.7 करोड़ टन आयरन ओर की जरूरत पड़ेगी।

बढ़ी हुई मांग और 2030 की डेडलाइन को देखते हुए कंपनी अब केवल घरेलू खदानों पर निर्भर नहीं रहना चाहती।
घरेलू मोर्चे पर भी जारी है विस्तार

कनाडा से आयात को एक बैकअप प्लान की तरह देखा जा रहा है, न कि घरेलू खदानों के विकल्प के तौर पर। कंपनी भारत में भी अपनी स्थिति मजबूत कर रही है। ओडिशा में गंधलपाड़ा और कालामंग जैसी खदानों में खनन क्षमता बढ़ाई जा रही है।

कंपनी की रणनीति साफ है कि भविष्य में कच्चा माल चाहे देश के भीतर से मिले या कनाडा से, टाटा स्टील की चिमनियों से धुआं निकलना बंद नहीं होना चाहिए। यह कदम कंपनी की दूरदर्शिता और \“\“रॉ मैटेरियल सिक्योरिटी\“\“ यानी कच्चे माल की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है।
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