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प्रतीकात्मक चित्र
संवाद सूत्र, जागरण, सैदपुर। 92 साल की उम्र...कंपकपाते हाथ और ऊपर से एक सप्ताह से बीमार विद्या सागर रस्तोगी अपने सुनसान घर में कैदियों का जीवन जीने को मजबूर थे। ऐसा नहीं था कि उनके औलाद नहीं थी। उनके दो बेटे अभी भी जीवित हैं। चारों बेटों की संतानें हैं लेकिन कभी पाल-पोसकर बड़ा करने के बाद उस संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ। अभी भी उनकी औलाद उनसे कुछ न कुछ लेने की हसरत रखती थी। इस समय उनको सहारे की आवश्यकता थी।
शायद इसीलिए उन्होंने अपने बेटों को पाल पोसकर बड़ा किया था। उन्हें इस काबिल बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। उन्हें सबसे ज्यादा दुख तब हुआ जब वह एक सप्ताह से बीमार थे और उन्हें देखने उनके अपने ही नहीं आए। इसलिए उन्होंने भी ठान लिया था कि अब वह जीवित नहीं रहेंगे। इससे उन्होंने तीन दिन पहले कहा था कि उसे जहर की गोली लाकर दे दो, जिससे वह आत्महत्या कर सकें।
विद्यासागर की दोनों पत्नियों की हो चुकी मृत्यु
कस्बा सैदपुर निवासी विद्या सागर रस्तोगी की दो पत्नियां थीं लेकिन इस समय साथ देने के लिए कोई भी जीवित नहीं थीं। दोनों पत्नियों के दो-दो बेटे हुए थे। सबसे बड़ा बेटा ब्रज किशोर शाहदरा दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहता है। उससे छोटे शिव किशोर की मृत्यु हो चुकी है। उसके चार बच्चे हैं, जिनमें एक बेटा हैं।
इनका परिवार बरेली में रह रहा है। उससे छोटे राज किशोर की भी मृत्यु हो चुकी है और उसका परिवार रुद्रपुर में रह रहा है। सबसे छोटा नंद किशोर भी बरेली में रहता है और वहां सोने चांदी की दुकान चलाता है। यानी विद्या सागर रस्तोगी का भरापूरा परिवार है। सब आराम से पैदा कर रहे हैं और अपना परिवार चला रहे हैं लेकिन इसके बावजूद 92 वर्षीय विद्या सागर रस्तोगी बड़ी कठिनाईयों से जूझ रहे थे।
शादियां होती गईं, सब अपना घर बसाते चले गए
उन्होंने अपने जीवन काल में कपड़ों पर सिलाई करके घर चलाया। जब कपड़ों की सिलाई करने लायक नहीं रहे तो उन्होंने अपने मकान में ही एक छोटी की सोने चांदी की दुकान खोल ली थी, जिससे उनका खर्चा चल रहा था। जैसे-जैसे बेटियों की शादियां होती गईं कि वह अपना अलग घर बसाते चले गए। जब पिछले साल भतीजे अंबरीश रस्तोगी की मां मुन्नी देवी का निधन हुआ था। तब यह पूरा परिवार एकत्र हुआ था।
उसके बाद लौटकर कभी मुड़कर नहीं देखा। भतीजे अंबरीश का कहना है कि यह छह माह पहले भी गंभीर रूप से बीमार हो गए थे। तब भी परिवार को सूचना दी गई थी। वह जब भी परिवार को सूचना देते थे, तब उन्हें एक ही ताना दिया जाता था कि हमें दिया ही क्या है। इससे उनकी भी बार-बार कहने की हिम्मत नहीं पड़ती थी।
जब वह गुरुवार को उन्हें दवा दिलाकर बदायूं से लौटे थे, तब वह ज्यादा परेशान थे और अचानक कहने लगे कि वह उन्हें एक जहर की गोली लाकर दे दें, जिससे वह खाकर आत्महत्या कर लें। इसके बावजूद उन्हें समझाया था कि कोई नहीं तो वह उनका उपचार कराएंगे। वह परेशान न हों लेकिन बुजुर्ग विद्या सागर ने आत्महत्या करने की ठान ली थी। इससे उन्होंने आत्मघाती कदम उठा लिया।
बेटा बोला- 22 दिसंबर को आया था और दवा दिलाकर गया था
पिछले माह 22 दिसंबर को अंबरीश की मां की बरसी थी। छोटा बेटा नंदकिशोर उसी में दावत खाने आया था और परिवार का कोई अन्य सदस्य नहीं आया। नंदकिशोर का दावा है कि वह उन्हें दवा लेकर आया था। डेढ़ साल पहले भी उन्हें अपने घर पर रखा था।
तब उनका उपचार कराया था। उनकी पेशाब की नली में कैंसर था। उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। वह लोगों के बहकावे में आ जाते थे। अभी पांच-छह दिन पहले उनकी भाभी शकुंतला पत्नी राजकिशोर आईं थीं और उन्हें ले जाने को भी कहा था लेकिन वह नहीं गए।
तिजोरी में वर्षों पुराना रखा था तमंचा
विद्या सागर रस्तोगी की तिजोरी में वर्षों पुराना 12 बोर का एक तमंचा भी रखा हुआ था। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो तिजोरी खुली पड़ी थी। इसके बारे में बहुत से लोगों को जानकारी नहीं थी। लोगों का अनुमान है कि वह शायद अपनी सुरक्षा के लिए तमंचा रखते थे।
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