क्या होता है घाटे का बजट?
नई दिल्ली। 1 फरवरी को केंद्रीय बजट (Union Budget 2026) पेश किया जाएगा। बजट से जुड़े कई शब्द आपने सुने होंगे। इनमें से एक शब्द है - घाटे का बजट। क्या आप इसका मतलब जानते हैं? न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया में बहुत से देश घाटे का बजट पेश करते हैं। आइए समझते हैं क्या होता है घाटे का बजट।
क्या होता है घाटे का बजट?
घाटे का बजट वह होता है जब सरकार की कुल आय, उसके कुल खर्च से कम होती है। यानी सरकार जितना खर्च करने की उम्मीद रखती है, उतना रेवेन्यू उसे टैक्स, शुल्क और अन्य स्रोतों से प्राप्त होने की उम्मीद नहीं होती। यह स्थिति तब बनती है जब सरकार को विकास योजनाओं, जनकल्याण कार्यक्रमों, रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य या आपदा प्रबंधन पर अधिक खर्च करना पड़ता है।
घाटे का बजट अपने आप में न तो पूरी तरह अच्छा है और न ही पूरी तरह बुरा। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि घाटा क्यों और किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
किन वजहों से बनता है घाटे का बजट?
घाटे का बजट बनने के कई कारण होते हैं -
- आर्थिक मंदी के समय टैक्स कलेक्शन कम हो जाता है, जबकि बेरोजगारी भत्ते और राहत योजनाओं पर खर्च बढ़ जाता है
- जनसंख्या वृद्धि, महंगाई, सब्सिडी का बोझ, चुनावी वादे और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी जरूरतें भी खर्च बढ़ाती हैं
- कई बार सरकार जान-बूझकर घाटे का बजट लाती है ताकि अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ाई जा सके और विकास को गति मिले। इस प्रकार घाटे का बजट आर्थिक नीति का एक उपकरण भी बन जाता है
कैसे पूरा होता है घाटा?
जब सरकार घाटे का बजट लाती है, तो वह अतिरिक्त फंड जुटाने के लिए कई उपाय अपनाती है। सबसे प्रमुख तरीका है उधार लेना। सरकार आंतरिक स्रोतों से जैसे बैंकों, वित्तीय संस्थानों और जनता से बांड या सरकारी प्रतिभूतियां जारी कर फंड जुटाती है।
इसके अलावा वह विदेशी कर्ज भी ले सकती है। कुछ स्थितियों में सरकार केंद्रीय बैंक से भी सहायता लेती है, जिसे मुद्रास्फीति का जोखिम माना जाता है। कभी-कभी सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी बेचकर या संपत्तियों का निजीकरण करके भी फंड प्राप्त किया जाता है।
घाटे का बजट - सही या गलत
घाटे के बजट के अपने लाभ और नुकसान दोनों हो सकते हैं। यदि उधार लिया गया फंड उत्पादक कार्यों, जैसे शिक्षा, उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाया जाए, तो भविष्य में आय बढ़ सकती है और घाटा संभालना आसान हो जाता है। लेकिन यदि यह फंड अनुत्पादक खर्चों में चला जाए, तो कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है और आर्थिक स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता है।
इसलिए घाटे का बजट बनाते समय सरकार के लिए संतुलन, पारदर्शिता और दीर्घकालिक सोच बेहद जरूरी होती है।
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