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यह तस्वीर जागरण आर्काइव से ली गई है।
मुकेश कुमार श्रीवास्तव, दरभंगा । शहर के चर्चित माधेश्वर मंदिर परिसर, आस्था के केंद्र श्यामा मंदिर के नाम से जाना जाता है। लेकिन, यह दरभंगा राज परिवार का निजी श्मशान है। जहां चिताओं पर भारत का दूसरा मंदिरों का संगम स्थल है। राज परिवार की समाधियों पर यहां मंदिरों का निर्माण कराया गया है।
चार महाराजा और चार महारानी के बाद महाराजाधिराज स्व. कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी महाधिरानी काम सुंदरी देवी का 12 जनवरी, सोमवार को अंतिम संस्कार किया गया। अब इनके चिता पर भी भव्य अनुपम मंदिर निर्माण कराया जाएगा। इसकी घोषणा कुमार कपिलेश्वर सिंह ने स्वयं की है।
इस श्मशान में राजा और महाराजा के रूप में राजशाही जीवन व्यतीत करने वालों में जिन अंतिम शख्स का दाह संस्कार हुआ, उसमें महाधिरानी कामसुंदरी देवी का नाम अंकित हो गया। जिनके चिता पर बनने वाला मंदिर इस परिसर का नवम होगा।
जम्मू की तरह, यहां सालों भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। शारदीय नवरात्रा हो या काली पूजा अथवा नवाह यज्ञ, यहां भी भक्तों की भीड़ लगी रहती है। शादी के अलावा तमाम शुभ कार्य होते हैं। लोग मेले का आनंद भी उठाते हैं। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहां पूजा करते हैं उनकी कामना माता पूर्ण करती है।
परिसर का एक मात्र माधेश्वर मंदिर है जो चिता पर नहीं है। हालांकि, दो दर्जन से अधिक समाधियों में दो पर महादेव और चार पर देवियों के मंदिर हैं। एक पर अर्द्धनिर्मित मंदिर है। वहीं महाराजा कामेश्वर सिंह की दूसरी पत्नी महारानी प्रिया की समाधि पर एक कमरे का निर्माण कराया गया है, जो आज भी बंद है। शेष समाधियों पर पर्यावरण को लेकर पेड़ लगे हुए हैं।
महाराज रूद्र सिंह का जला था पहला चिता
वर्ष 1762 में महाराजा माधव सिंह ने महादेव मंदिर की स्थापना कर अपने निजी श्मशान का नाम माधेश्वर परिसर रखा। परिसर का एक मात्र माधेश्वर मंदिर है जो चिता पर नहीं है। हालांकि, माधेश्वर महादेव मंदिर के परिसर में ही राजा माधव सिंह की अस्थि कलश रखी हुई है। उनका निधन दरभंगा में नहीं होने के कारण ऐसा किया गया था।
यहां माधव सिंह के पोत्र महाराजा रूद्र सिंह की पहली चिता दक्षिण दिशा में जलाई गई। जिस पर रूद्रश्वरीकाली मंदिर है। पूरब दिशा में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की समाधि पर वर्ष 1900 में लक्ष्मीश्वरी तारा मंदिर बना है।
वर्ष 1933 में महान तंत्र साधक महाराजा रामेश्वर सिंह के चिता पर रमेश्वरी श्यामा मंदिर का निर्माण किया गया, जो आज श्यामा मंदिर के नाम से विख्यात है। उत्तर दिशा में राज माता रमेश्वरी लता की समाधि पर अन्नपूर्णा मंदिर का निर्माण किया गया।
मंदिर में अन्नपूर्णा के साथ ही पृथ्वी माता व लक्ष्मी की मूर्ति भी स्थापित है। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की पहली पत्नी लक्ष्मेश्वरी की समाधि में छोटा महादेव मंदिर का निर्माण कराया गया। सबसे नया मंदिर तिरहुत रियासत के आखिरी राजा व पूर्व राज्यसभा सदस्य महाराजा कामेश्वर सिंह की समाधि पर बना मंदिर कामेश्वरी श्यामा का है।
परिसर के दक्षिण व पश्चिम कोने पर अवस्थित इस मंदिर का निर्माण महारानी राज लक्ष्मी ने वर्ष 1965 में अपने आभूषण बेचकर कराया था। रमेश्वरी श्यामा मंदिर व अन्नपूर्णा मंदिर के बीच में महाराजा रमेश्वर सिंह की दूसरी पत्नी महारानी रमेश्वरी की समाधि पर अर्द्धनिर्मित मंदिर है। जिसे चबूतरा का रूप देकर भजन व संकीर्तन का आयोजन किया जाता है। अब यहां सबसे अंतिम महाधिरानी काम सुंदरी देवी का अंतिम संस्कार किया गया है। जिनके लिए पहले से जगह सुरक्षित थी।
1982 के बाद जली तीसरी चिता
वर्ष 1982 में युवराज जीवेश्वर सिंह के बाद सात सितंबर 2020 को दरभंगा राज के सबसे बड़े कुमार स्व. जीवेश्वर सिंह की धर्मपत्नी राजकिशोरीजी का और 16 जनवरी 2022 को राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह का अंतिम संस्कार इस परिसर में हुआ था। जिनके चिता पर मंदिर के जगह विशाल पेड़ अवस्थित है।
अब महाधिरानी काम सुंदरी का अंतिम संस्कार हुआ है। बता दें कि राजकुमार शुभेश्वर सिंह का निधन दरभंगा से बाहर होने के कारण उनका अंतिम संस्कार इस परिसर में नहीं हो सका।
हालांकि, उनके लिए भी यहां एक जगह आरक्षित थी। इस श्मशान में महाराजा रामेश्वर सिंह की दूसरी पत्नी रमेश्वरी, महाराजा कामेश्वर सिंह की दूसरी पत्नी महारानी प्रिया, महाराजा कामेश्वर सिंह के छोटे भाई व दरभंगा इप्रुमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन राजा बहादुर विशेश्वर सिंह एवं उनकी पत्नी सहित आदि कई के समाधियों पर पर्यावरण के लिए पेड़ लगाए गए हैं जो लोगों को स्वच्छ हवा ही नहीं बल्कि, छांव भी दे रही हैं। |
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