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पहली हार में ही पीके की जसुपा से होने लगा मोहभंग; आनंद म‍िश्रा और रितेश पांडेय के बाद अब कौन?

deltin33 1 hour(s) ago views 264
  

प्रशांत क‍िशोर की पार्टी छोड़ सकते हैं कई और नेता।  



राज्य ब्यूरो, पटना। Bihar News: भारतीय पुलिस सेवा (IPS) से वीआरएस लेकर आए आनंद मिश्रा को जन सुराज पार्टी (जसुपा) ने अपनी युवा इकाई की कमान सौंपी थी। बड़ा दारोमदार था।

उन्होंने पूरे बिहार में बाइक रैली निकाली थी। उसी बीच भाजपा से निमंत्रण आ गया। आनंद मिश्रा लपक लिए। बक्सर से भाजपा के विधायक भी चुन लिए गए।

तब जसुपा ने आने-जाने वालों से स्वयं को बेपरवाह बताया था। अब बारी भोजपुरी गायक व अभिनेता रितेश पांडेय की है, जो विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर के गृह क्षेत्र करगहर में मात खा चुके हैं।

जसुपा से रितेश ने अपने संबंध तोड़ लिए हैं। चर्चा है कि आरसीपी सिंह भी जदयू में वापस हो जाएंगे। अस्थावां से उनकी पुत्री लता जसुपा के टिकट पर दांव आजमा चुकी हैं।

बताते हैं कि चुनावी मैदान में उतारे गए जसुपा के एक तिहाई से अधिक चेहरे कन्नी काट चुके हैं, बेशक उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की हो।  

रोचक यह कि आरसीपी की जसुपा में इंट्री के बाद आनंद का मन उचाट होने लगा था। तब दोतरफा बयानों का एक दौर भी चला था।

हालांकि, तब तक भाजपा से उनकी पींगें भी बढ़ चुकी थीं। उन्होंने वीआरएस भी भाजपा से जुड़ी अपनी राजनीतिक अपेक्षा में ही ली थी।

बक्सर में भाजपा के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग भी ले रहे थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरकर मात खाए और फिर जसुपा में आए।
रितेश के बाद अब आरसीपी सिंह भी छिटकने की कतार में

जदयू से अलगाव के बाद आरसीपी ने अपनी पार्टी (आप सबकी आवाज) बनाई और बिहार में धूम मचा देने का दावा करते रहे।

जसुपा में अपनी पार्टी के विलय के साथ ही उन्होंने प्रशांत किशोर से गलबहियां की थी। इस समझौते में पुत्री को टिकट भी मिला, जो 15962 वोट पाकर अस्थावां में तीसरे स्थान पर रहीं।

यह आरसीपी का गृह क्षेत्र है। रितेश की कहानी कुछ अलग है। वे अलग-अलग क्षेत्र की उन दूसरी हस्तियों की तरह सीधे जसुपा में आए, जिनका उससे पहले तक कोई राजनीतिक सरोकार नहीं था।

करगहर में पहले पीके के दांव आजमाने की चर्चा थी, लेकिन मैदान में रितेश उतरे। खाते में आए 16298 वोटों के सहारे अब वे जसुपा के साथ अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं समझ रहे।

ऐसे दर्जनों चेहरे हैं, जो पुराने संबंधों के हवाले से सार्वजनिक तौर पर मुखर तो नहीं हैं, लेकिन बिहार की राजनीति से उनका मन उचट सा गया है। भविष्य में जसुपा में सांगठनिक फेरबदल के लिए करारी पराजय के साथ यह भी एक कारण है।

विधानसभा चुनाव में जसुपा को 3.44 प्रतिशत वोट मिले थे। प्रत्याशियों की घोषणा तो उसने उसने सभी 243 सीटों के लिए की थी, लेकिन मैदान में 238 ही डटे रहे।

लोजपा-रामविलास के अभ्यर्थी का आवेदन निरस्त होने के कारण मढ़ौरा में उसे निकटतम प्रतिद्वंद्वी होने का सौभाग्य रहा। 129 सीटों पर उसके प्रत्याशी तीसरे 73 पर चौथे और 24 पर पांचवें स्थान पर रहे। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि 33 सीटों पर उसे जीत-हार के अंतर से अधिक वोट मिले।
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