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पंजाब में माघी मेला आज, नूरदीन की कब्र पर बरसेंगे जूते-चप्पल; जानें इस दिन का महत्व और इतिहास

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नूरदीन की कब्र पर जूते मारते हुए सिख (जागरण ग्राफिक्स)



डिजिटल डेस्क, श्री मुक्तसर साहिब। आज देश भर में मकर संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। वहीं, पंजाब के मुक्तसर में आज माघी मेले का आयोजन भी किया जा रहा है। बैसाखी और बंदी छोड़ यानी दिवाली के बाद इसे सिख धर्म का तीसरा सबसे बड़ा पर्व माना जाता है।

इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु गुरुद्वारे माथा टेकने आते हैं और सरोवर में स्नान करते हैं। इस मेले को एक खास तरीके से और मनाया जाता है। दरअसल, मेले में सबसे चर्चित कब्र पर जूते-चप्पल मारने की भी परंपरा है। यह परंपरा क्या है और किसकी कब्र पर जूते मारे जाते हैं तथा इसका क्या महत्व है। आइए, इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

मुक्तसर का माघी मेला उन 40 सिखों की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने गुरू गोबिंद सिंह जी के लिए लड़ने से इनकार कर दिया था, लेकिन माई भागों की प्रेरणा से बाद में ऐसी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
किसकी कब्र पर मारे जाते हैं जूते?

दरअसल, जिस व्यक्ति की कब्र पर जूते मारे जाते हैं, उसका नाम नूरदीन हैं। बीजेपी नेता तेजिंदर बग्गा के मुताबिक, नूरदीन ने गुरु गोबिंद सिंह जी को धोखा देकर मारने की साजिश रची थी। लेकिन जब उसने उन्हें मारने की कोशिश की तो वह नाकाम रहा और गुरुजी के हाथों अपनी जान गंवा बैठा। यह घटना पंजाब के मुक्तसर साहिब के पास हुई थी। जिस स्थान पर यह घटना घटी, वहां आज गुरुद्वारा दातनसर मौजूद है। गुरुद्वारे से थोड़ी दूरी पर ही नूरदीन की कब्र बताई जाती है।
नूरदीन ने कैसे धोखा दिया?

नूरदीन को लेकर कई मान्यताएं हैं, जिनमें सबसे प्रमुख मुगलों की साजिश को बताया जाता है। भाजपा नेता के मुताबिक, भारत अतिक्रमण के समय मुगलों को इस बात का एहसास हो गया था कि जंग के मैदान में गुरु गोबिंद सिंह जी को हराना आसान नहीं है। इसलिए उन्होंने एक साजिश रची। साजिश रचने के लिए मुगलों ने एक नूरदीन नाम के व्यक्ति को सिख के भेष में गुरु गोबिंद सिंह की सेना में शामिल करवा दिया।

एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जब दातुन कर रहे थे, उसी समय नूरदीन ने पीछे से तलवार से उन पर हमला करने की कोशिश की। लेकिन वह प्रहार करने में नाकाम रहा और गुरु गोबिंद सिंह जी ने उसके सिर पर लोटा दे मारा, जिससे उसकी मौत हो गई। गद्दारी करने और धोखा देने के विरोध के प्रतीक के रूप में इस दिन को ऐतिहासिक स्मृति के रूप में देखा जाता है और नूरदीन की कब्र पर प्रतीकात्मक रूप से पांच-पांच बार जूते-चप्पल मारे जाते हैं, यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
40 सिंहों ने किया मुगलों का सामना

खिदराणा की ढाब के नाम से जानी जाने वाली इस धरती (श्री मुक्तसर साहिब) पर मुगलों के साथ गुरु गोबिंद सिंह के निर्णायक युद्ध के दौरान अंतिम सांसें गिन रहे भाई महा सिंह की मांग पर गुरु जी से बेदावा फाड़कर दी गई मुक्ति से खिदराणा की ढाब मुक्तसर हो गई। जिसे अब श्री मुक्तसर साहिब कहा जाता है।

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खिदराणा से कैसे बना मुक्तसर?

जब हार मानने लगी सेना: श्री मुक्तसर साहिब से जुड़े इतिहास के मुताबिक, तीन सौ साल पहले मुगलों से लड़ाई के समय जब सिख फौज थक गई तो सिंहों ने गुरु गोबिंद सिंह जी से वापस जाने की आज्ञा मांगी। गुरु जी ने उन्हें अनुमति दी लेकिन एक शर्त भी रखी

मैं तुम्हारा गुरु नहीं: गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा कि जाना है तो चले जाओ लेकिन मैं अब तुम्हारा गुरु नहीं और तुम मेरे सिख नहीं। ये बात सुनकर सभी सिंह बेदावा देकर चले गए। लेकिन जब वे अपने-अपने घर पहुंचे तो उनके परिवारों (महिलाओं) ने उनसे काफी नाराजगी जताई और कहा कि यदि तुम गुरुजी के साथ नहीं लड़ सकते तो हम चले जाते हैं। उस समय माता भाग कौर के नाम से जानी जाने वाली क्षेत्र की दलेर सिंहणी ने सिंहों की गैरत को ललकारा और खुद ही तलवार लेकर निकल पड़ी। उसे देख बेमुख होकर लौटे चालीस सिंह भी गुरु जी की तलाश में वापस हो लिए।

खिदराणा की ढाब पर हुआ मुगलों से सामना: उस समय खिदराणा की ढाब (जगह का नाम) पर जब सिंह पहुंचे तो उनका सामना मुगल सेनाओं के साथ हो गया। सिंहों ने मुगलों का डटकर सामना किया और उन्हें खदेड़ा भी, लेकिन इस जंग में सभी बलिदान हो गए

बेदावा फाड़कर सभी सिंहों को किया माफ: युद्ध खत्म होने पर जब गुरु जी खिदराणा पहुंचे तो युद्ध में शहीद सिंहों को संभालते हुए भाई महा सिंह के पास पहुंचे, वह अभी जीवित थे। गुरु जी ने उसका सिर गोदी में लेकर कहा महा सिंह मागों क्या मांगते हो। इस पर भाई महा सिंह ने कहा कि गुरु जी सिंहों का दिया बेदावा फाड़ कर टूटी श्रद्धा जोड़ दो। इस पर गुरु जी ने बेदावा फाड़कर सिंहों को मुक्त कर दिया, तभी से खिदराणा की ढाब का नाम मुक्तसर पड़ा जिसे अब श्री मुक्तसर साहिब के नाम से जाना जाता है।

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