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ये काटा... वो काटा! मकर संक्रांति पर रामपुर की पतंगों ने रचा इतिहास, आंकड़ा जान चौंक जाएंगे

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दुकानों पर बि‍कतीं पतंगें



अनिल अवस्थी, जागरण, रामपुर। मकर संक्रांति पर देश भर में रामपुरी पतंग खूब उड़ी। मुख्य रूप से दिल्ली, पंजाब और जयपुर में यहां से पतंग भेजी गई। कुल मिलाकर 50 लाख से अधिक पतंग रामपुर से भेजी गईं। इससे न सिर्फ कारीगर उत्साहित हैं बल्कि, कारोबारी भी खुश नजर आए।

रामपुर में पतंग का कारोबार सैकड़ों वर्ष पुराना है। यहां एक हजार से अधिक परिवारों की आजीविका इस व्यवसाय पर निर्भर है। शहर में सौ अधिक पतंग के कारखाने हैं। इनमें ही करीब छह-सात सौ कारीगर काम कर रहे हैं। पतंग के थोक कारोबारी अकरम अली बताते हैं कि इस व्यवसाय का मुख्य रूप से सीजन दीपावली से लेकर मकर संक्रांति तक ही होता है।

  

गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर भी पतंग की मांग बढ़ जाती है। हालांकि प्रमुख पर्वों पर देश भर से मिलने वाले आर्डर के लिए साल भर पतंग तैयार कराई जाती हैं। इससे इस कारोबार में लगे कारीगर के हाथ खाली नहीं होते। वह बताते हैं कि इस बार मकर संक्रांति पर जिले भर से 10 लाख से अधिक पतंगें आर्डर पर दिल्ली, पंजाब व जयपुर तक भेजी गई हैं।

पतंग बनाने के लिए कागज खटीमा व लकड़ी कोलकाता और आसाम से आती है। पतंग कारीगर अयान बताते हैं कि एक कारीगर दिन भर में लगभग एक हजार पतंग तैयार कर लेता है। इसका मतलब यह नहीं हुआ कि वह पूरी कंप्लीट पतंग तैयार करता है। वह सिर्फ अपने हिस्से का काम जैसे डिजाइन में काटना या तीली लगाने का काम करता है।

एक हजार पतंग पर उसे तीन सौ से चार सौ रुपये तक मिल जाते हैं। इस बार भरपूर आर्डर मिलने से कारीगर भी उत्साहित हैं। वहीं कारीगर फैजान कहते हैं कि एक हजार पतंग का काम करने के लिए अमूमन 12 घंटे का समय लग जाता है। ऐसे में कारीगरों को मिलने वाला मेहनताना कम ही है। इस पर कारोबारियों से लेकर जिम्मेदारों को ध्यान देना चाहिए।
आठ लोगों को रोजगार देती है एक पतंग

महज पांच रुपये में हाथ आने वाली पतंग के पीछे कारोबार का बड़ा गणित छिपा है। एक पतंग तैयार होने में आठ कारीगरों को काम मिलता है। कारीगर फैजान बताते हैं कि साइज के लिहाज से अद्धी, मंझोला, पौना, कोंताइल जैसे नामों से अलग-अलग पतंगें बनती हैं।

इनको तैयार करने में अलग-अलग कारीगर कागज काटने, जोड़ने, पट्टा लगाने, ठड्डा लगाने, तीली लगाने, डोरी जोड़ने और फिर पैकिंग करने का काम करते हैं। कारखाने में तैयार कच्ची पतंग को पूरी तरह से तैयार करने के लिए गांवों में भेज दिया जाता है। जहां अधिकांशत: महिलाएं इस पर काम करती हैं। इस तरह पतंग से ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को भी घर बैठे काम मिल रहा है।
चुनौतियों से जूझ रहा पतंग कारोबार

आसमान पर उड़ने वाली पतंग का कारोबार चुनौतियों से जूझ रहा है। कारोबारी नदीम बताते हैं कि मुख्य रूप से महज तीन महीने काम चलता है, नौ महीने खाली बैठना पड़ता है। लकड़ी व कागज खराब होने के डर से इसका स्टाक भी नहीं कर सकते हैं। इस व्यवसाय के संगठित और व्यवस्थित न होने के कारण भी ये पतंग सी उड़ान नहीं भर पा रहा है।
चायनीज मांझे ने किया कलंकित

पतंग व्यवसाय जहां मनोरंजन के साथ ही शारीरिक व्यायाम का एक जरिया माना जाता रहा है वहीं इसे उड़ाने में चायनीज मांझे का प्रयोग कई लोगों की जान का दुश्मन बन चुका है। पतंग कारोबारी अकरम कहते हैं कि इस व्यवसाय के लिए चायनीज मांझा कलंक बन गया है। इसके चलते कई लोगों ने पतंगबाजी से दूरी बना ली है। प्रशासन सख्ती के साथ इसके प्रयोग पर रोक लगाए तभी बात बनेगी। कारोबारी शाहिद इदरीसी ने भी दोहराया कि चाइनीज मांझा पतंग कारोबार की रीढ़ तोड़ रहा है, इस पर रोक लगे।




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