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उत्तराखंड का एक परिवार, जिसमें कई सैनिक और राष्ट्र को समर्पित जीवन; सेना दिवस पर खास पेशकश

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कुकरेती परिवार के पांच भाइयों ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में मातृभूमि की रक्षा के लिए अद्भुत साहस का परिचय दिया। Concept Photo



सुकात ममगाई, देहरादून। किसी भी युद्ध का गौरव केवल रणभूमि में दिखाई गई वीरता से नहीं मापा जा सकता। उसका मूल आधार होता है संकल्प, समर्पण और बलिदान, जहां सैनिक अपने निजी सुख, परिवार और भविष्य को राष्ट्र के लिए अर्पित कर देते हैं। ऐसे ही त्याग और देशभक्ति की जीवंत मिसाल दून के कुकरेती परिवार की कहानी में देखने को मिलती है। कुकरेती परिवार के पांच भाइयों ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना की ओर से मोर्चे पर डटकर मातृभूमि की रक्षा के लिए अद्भुत साहस का परिचय दिया।

यह परिवार अपने आप में अनोखा है, क्योंकि तीन भाई राजपूत रेजिमेंट में मोर्चे पर थे, जबकि जबकि दो भाई भारतीय सेना की ईएमई (इलेक्ट्रानिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स) कोर में तकनीकी और रणनीतिक जिम्मेदारियों को निभा रहे थे। अलग-अलग मोर्चों और भूमिकाओं के बावजूद सभी भाइयों का ध्येय एक ही था, देश की रक्षा करना।

युद्ध के बाद पांचों भाई सकुशल स्वदेश लौटे। समय के साथ चार भाई मेजर जगदीश प्रसाद कुकरेती, मेजर जनरल पीएल कुकरेती, नायक सूबेदार सोहनलाल कुकरेती और कुकरेती परिवार ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अद्भुत साहस का परिचय दिया
युद्ध के बाद पांचों भाई सकुशल स्वदेश लौटे, राकेश कुकरेती युद्ध के साक्षी

लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती स्वयं मेजर धर्मलाल कुकरेती अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती आज भी उस युद्ध की वीर गाथा के सजीव साक्षी हैं। शौर्य चक्र सहित पांच वीरता पुरस्कार और अनेक मेडल प्राप्त करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती बताते हैं कि युद्ध से पहले पाकिस्तान की मुक्ति वाहिनी बांग्लादेश की तरफ से भारत की सीमा की ओर बढ़ रही थी। भारतीय सेना त्रिपुरा के धर्मनगर पहुंची और दस ग्राम इलाके में कैंप स्थापित किया गया। पाकिस्तानी सेना बार-बार रेलवे लाइन को विस्फोट कर भारतीय सेना की रसद बाधित कर रही थी, लेकिन भारतीय सेना ने समय रहते उनके मंसूबों को नाकाम कर दिया।

एक दिसंबर 1971 को पकड़े गए पाकिस्तानी इंटेलिजेंस के सूबेदार ने खुलासा किया कि भारत में पाक के खबरी सक्रिय हैं। इसके बाद रेकी अभियान तेज हुआ। लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती और उनकी टीम ने दुश्मन की तैनाती की महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाकर अपनी ब्रिगेड तक पहुंचाई।

कुकरेती बताते हैं कि युद्ध के दौरान वह लोग तीन दिन तक बिना खाए-पिए 93 किमी तक पैदल चले। ऐसा भी वक्त आया जब पांच दिन बाद फ्रेश खाना खाया, पर तमाम चुनौतियों के बावजूद हौसला शिखर पर था। गाजीपुर, क्लोरा, हलाई चारा, फेंचुगंज और अंततः ढाका तक भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए विजय पताका लहराई। कुकरेती परिवार की वीरता केवल 1971 के युद्ध तक सीमित नहीं रही। इस परिवार को अब तक चार वीरता पुरस्कार मिल चुके हैं।

मेजर जनरल प्रेम लाल कुकरेती को सेना मेडल, लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती को शौर्य चक्र, उनके पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल कार्तिकेय कुकरेती को सेना मेडल और दूसरे पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल अर्थ कुकरेती को मॅशन इन डिस्पैच से सम्मानित किया गया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई गई राष्ट्रसेवा और बलिदान की यह कहानी न केवल 1971 के युद्ध का गौरव उजागर करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और गर्व का प्रतीक भी है। देहरादून का यह परिवार सचमुच सेना दिवस के अवसर पर पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है।

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