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1806 में बनी थी देश की दूसरी सबसे बड़ी मेरठ छावनी, 1971 सहित कई युद्धों और आपरेशनों में रहा है इसका महत्वपूर्ण योगदान

cy520520 2026-1-15 16:58:13 views 1246
  

मेरठ छावनी में बने सैन्य म्यूजियम में दर्शाया गया है भारतीय सेना के पराक्रम का इतिहास। जागरण



अमित तिवारी, जागरण, मेरठ। देश की सरहदों पर तैनात भारतीय सेना के लिए मेरठ छावनी विशेष महत्व रखती है। सैन्यबल के हिसाब से देश की दूसरी सबसे बड़ी छावनी मेरठ का महत्व देश की उत्तरी सीमाओं पर हर हलचल में रहता है। इन क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों के बढ़ने से मेरठ छावनी से भी सैन्य टुकड़ियों को रवानगी दी जाती है।

एक रेजिमेंटल सेंटर और दो इंफैंट्री डिवीजन के साथ सौ से अधिक बटालियनों वाली मेरठ छावनी सैन्यबल के हिसाब से देश की दूसरी सबसे बड़ी छावनी मानी जाती है। भारतीय सेना की सबसे बड़ी जीत वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी छावनी स्थित पाइन डिवीजन ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की सबसे सुरक्षित जेसोर छावनी पर कब्जा किया था। 15 जनवरी को सेना दिवस है।

दरअसल, फील्ड मार्शल केएम करियप्पा ने 15 जनवरी 1949 को भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ (सेनाध्यक्ष) का पद संभाला था और इसी तिथि को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है। करियप्पा 14 जनवरी 1953 को रिटायर हुए थे। सेना इस तिथि को वेटरन्स डे के रूप में मनाती है।

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स्ट्राइक फोर्स हैं दोनों डिवीजन

छावनी में तैनात सेना की दोनों डिवीजन स्ट्राइक फोर्स यानी हमलावर डिवीजन मानी जाती हैं। पाइन डिव के नाम जहां वर्ष 1971 के युद्ध का पराक्रम जुड़ा है, वहीं चार्जिंग रैम डिवीजन के नाम भी स्ट्राइक कोर का हिस्सा बनकर आपरेशन पराक्रम के कारनामे जुड़े हैं।
दोनों ही डिव के साथ छावनी में एक-एक ब्रिगेड रहती है, जिनका तमाम युद्ध और आपरेशनों में अहम योगदान रहा है। दोनों डिवीजनों के अंतर्गत छावनी में आने व जाने वाली बटालियनों में 50 से 200 साल तक पुरानी बटालियन हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से अब तक हर जिम्मेदारी में खरा उतरकर बटालियन, सेना और देश की इज्जत-ओ-इकबाल को बुलंद रखा है।
1806 में बनी थी छावनी

गंगा-जमुना का यह दोआब क्षेत्र अंग्रेजों को 1803 में मिला था। लसवारी युद्ध के बाद मराठाओं से हुई संधि के बाद राजा सिंधिया ने इस क्षेत्र को अंग्रेजों को सौंप दिया था। वर्ष 1806 में अंग्रेजों ने मेरठ फोर्ट की दीवार के निकट छावनी को बसाया था। वह दीवार अब नहीं है। 1857 की क्रांति भी मेरठ में हुई, जिसमें अंग्रेजों को काफी नुकसान हुआ। ]

मेरठ छावनी में तैनात सैनिकों ने प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध के साथ ही बेल्जियम के वाइप्रस युद्ध, बर्मा आपरेशन, फ्रांस युद्ध और आजादी के बाद वर्ष 1965, वर्ष 1971 और कारगिल युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी। एक समय यहां सात रेजिमेंटल सेंटर थे। वर्ष 1976 में पांच रेजिमेंटल सेंटर के जाने के बाद पाइन इंफैंट्री डिवीजन और चार्जिंग रैंम डिवीजन ने उनका स्थान लिया। आजादी के बाद यूबी एरिया के अंतर्गत मेरठ सब-एरिया को पश्चिम यूपी सब-एरिया बनाया गया। महावीर चक्र से सम्मानित ब्रिगेडियर यदुनाथ पहले भारतीय सब-एरिया कमांडर थे।

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छावनी में है फील्ड मार्शल के निशां
फील्ड मार्शल केएम करियप्पा भले मेरठ न आए हों पर उनके निशां यहां मौजूद हैं। सेंट मेरीज एकेडमी के सामने के रास्ते का नाम केएम करियप्पा मार्ग ही है। इसके अलावा पाइन डिवीजन की ओर से बनाए गए सैन्य म्यूजियम धरोहर में भारतीय सेना के सफल आपरेशनों के विवरणों के साथ ही फील्ड मार्शल केएम करियप्पा की प्रतिमा भी रखी गई है।
प्रशिक्षित कर फौजी बनाती है आरवीसी

भारतीय सेना की ट्रेनिंग कमांड के अंतर्गत संचालित आरवीसी सेंटर एंड कालेज में नए युवाओं का प्रशिक्षण होता है। उन्हें बेहतरीन सैनिक बनाकर विभिन्न सैन्य यूनिटों में भेजा जाता है। इसके साथ ही डाग ब्रीडिंग एंड ट्रेनिंग फैकल्टी में श्वानों की विभिन्न प्रजातियों के प्रजनन से प्रशिक्षण तक की रूपरेखा यहीं बनती हैं।

यहीं प्रशिक्षण मिलता है और एक बेहतरीन फौजी बनकर वह श्वान देश की सीमाओं की रक्षा में तैनात होते हैं। आरवीसी स्थित इक्वेट्रियन विंग में घोड़ों का प्रशिक्षण घुड़सवारी प्रतियोगिताओं के लिए किया जाता है। आरवीसी के अंतर्गत ही संचालित सहारनपुर सेंटर में खच्चरों को सैन्य साजो सामान पहाड़ी चोटियों पर चढ़ाने के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है।
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