काम की बढ़ी रफ्तार लेकिन भरोसा कम AI पर ग्लोबल रिपोर्ट का बड़ा खुलासा (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को काम को तेज करने वाला सबसे बड़ा टूल माना जा रहा है, लेकिन नई रिसर्च बता रही है कि इससे मिलने वाला फायदा उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है। AI से समय तो बच रहा है, लेकिन उसी समय का बड़ा हिस्सा गलतियों को सुधारने में खर्च हो रहा है।
वर्कडे की नई ग्लोबल रिपोर्ट और रिसर्च डेटा AI की इस दोहरी सच्चाई को सामने लाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 85% कर्मचारी मानते हैं कि एआई टूल्स से उन्हें हर हफ्ते 1 से 7 घंटे तक का समय बचता है। लेकिन, इस बचे हुए समय का करीब 40% हिस्सा दोबारा काम करने में चला जाता है।
कहां जाता है कर्मचारियों का समय?
कर्मचारियों को AI के आउटपुट में गलतियां सुधारनी पड़ती हैं, कंटेंट फिर से लिखना होता है और नतीजों की जांच करनी पड़ती है। रिपोर्ट इसे \“फॉल्स सेंस ऑफ प्रोडक्टिविटी\“ यानी झूठी उत्पादकता की भावना कहती है।
रोज AI इस्तेमाल करने वाले कर्मचारियों में से 77% लोग एआई से बने काम को उतनी ही बारीकी से जांचते हैं जितना इंसान के काम को और कुछ तो उससे भी ज्यादा सावधानी बरतते हैं। इससे साफ है कि AI से रफ्तार बढ़ी है, लेकिन भरोसा नहीं।
कंपनियां पुराने स्ट्रक्चर का कर रही इस्तेमाल
रिपोर्ट के मुताबिक, 89% कंपनियों ने अब तक अपने आधे से भी कम जॉब रोल्स को AI के हिसाब से अपडेट किया है। यानी कर्मचारी 2025 के AI टूल्स को अब भी 2015 के जॉब स्ट्रक्चर में इस्तेमाल कर रहे हैं। कंपनियां एआई से हुई समय की बचत का 39% हिस्सा दोबारा टेक्नोलॉजी में ही निवेश कर रही हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि एआई को अपनाया तो जा रहा है, लेकिन काम करने के तरीके और जिम्मेदारियां अब भी पुरानी हैं।
अमेरिका और चीन की यूनिवर्सिटीज के 4.13 करोड़ रिसर्च पेपर्स के विश्लेषण से एक और अहम तस्वीर सामने आई है। एआई इस्तेमाल करने वाले वैज्ञानिक तीन गुना ज्यादा पेपर प्रकाशित कर रहे हैं और उन्हें पांच गुना ज्यादा सिटेशन मिल रहे हैं।
तेज हुआ काम
ये वैज्ञानिक औसतन एक साल चार महीने पहले प्रोजेक्ट लीडर भी बन जाते हैं। हालांकि, एआई के बढ़ते इस्तेमाल से रिसर्च विषयों की विविधता में 4.63% की गिरावट दर्ज की गई है। यानी काम तेज हुआ है, लेकिन नए और अलग विषयों की खोज कमजोर पड़ी है।
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