चैनल से जुड़े एक कर्मचारी बताते हैं कि जब मीडिया में यह खबर आई की चैनल बंद हो रहा है और रिकॉर्डेड कार्यक्रम के जरिए चल रहा है, तब से उत्तर प्रदेश सरकार ने चैनल को मिलने वाले विज्ञापन पर रोक लगा दी.
जहां एक तरफ यूपी सरकार ने विज्ञापन रोक दिए वहीं दूसरी तरफ पंजाब सरकार लगातार विज्ञापन दे रही है. हालांकि पंजाब सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की निदेशक सोनाली गिरी कहती हैं, “मेरी जानकारी के अनुसार हम ऐसे किसी चैनल को विज्ञापन नहीं दे रहे है. अगर विज्ञापन देने की जानकारी पाई गई तो हम जरूर कार्रवाई करेगें.”
यह जान लें कि इंडिया अहेड चैनल और दिल्ली सरकार के बीच दिल्ली शराब नीति मामले में भी तार जुड़े हैं.
पहला तो कथित दिल्ली शराब घोटला मामले में जहां चैनल के एमडी जमानत पर हैं. वहीं चैनल के सेल्स और मार्केटिंग प्रेसिडेंट रहे अर्जुन पांडेय के खिलाफ भी सीबीआई ने अगस्त में एफआईआर दर्ज की है. आरोप है कि पांडेय, न्यूज़ चैनल में काम करने के अलावा दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के सहयोगी भी हैं.
हालांकि न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए भूपेंद्र चौबे कहते हैं, “पांडेय ने पहले ही कंपनी से इस्तीफा दे दिया. अब वे यहां काम नहीं करते.”
पंजाब सरकार से लगातार विज्ञापन मिल रहा है बावजूद इसके कर्मचारियों का भुगतान नहीं किया जा रहा है. कई कर्मचारियों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उन्होंने कंपनी को अपने बकाया भुगतान के लिए मेल भी भेजा है लेकिन कोई जवाब नहीं आ रहा है.
चैनल से जुड़े एक सीनियर पत्रकार पंकज मिश्रा ने तो अपने बकाया भुगतान को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत तक कर दी है. लगातार मेल भेजने के बाद, फरवरी महीने में उन्होंने अन्य लोगों के साथ-साथ गौतम मूथा को जब मेल कर दिया तो पहली बार कंपनी की तरफ से उन्हें प्रतिक्रिया तो मिली लेकिन अभी तक भी उन्हें बकाया नहीं मिला है.
सैलरी के नाम पर सिर्फ वादा

इंडिया अहेड कंपनी की सबसे बड़ी समस्या है कि वह सैलरी मांगने वाले कर्मचारियों का कोई जवाब नहीं देती है. चाहे कोई छोटा कर्मचारी हो, रिपोर्टर हो या सीनियर एडिटर. कंपनी का सभी के साथ एक जैसा बर्ताव है.
कंपनी के साथ बतौर एडिटर जुड़े रहे एक कर्मचारी का तीन लाख से ज्यादा का बकाया है. वह कहते है, “बच्चों की फीस, घर का किराया, बैक से लिया कर्ज आदि नहीं भर पा रहे हैं. पिता से पैसे मांगे हैं ताकि यह जरूरी खर्च चला सकें. भूपने चौबे, सुदीप मुखिया, एचआर और यहां तक कि गौतम मूथा तक को सैलरी को लेकर मेल किया है लेकिन अभी तक भुगतान नहीं किया गया है.”
एक महिला कर्मचारी, जिनकी सैलरी मात्र 21 हजार रुपए थी, उन्हें करीब दो महीने की सैलरी नहीं दी गई. जब वह दूसरी कंपनी में ज्वाइन करना चाह रही थीं तब इंडिया अहेड ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. और न ही सैलरी दी.
कर्मचारी ने उत्तर प्रदेश महिला आयोग को भी फरवरी महीने में एक पत्र लिखा था. हालांकि एक महीना बीत जाने के बाद भी उन्हें आयोग की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है.
कंपनी में अभी भी एक सीनियर पद पर काम करने वाले एक कर्मचारी कहते हैं, “सैलरी नहीं मिलने के कारण परिवार को वापस गांव भेजना पड़ा. दूसरों से उधार लेकर खर्च चला रहा हूं.”
वहीं सैलरी नहीं मिलने के कारण बिहार के रहने वाले एक कैमरामैन अपने साथ कंपनी का कैमरा और लाइव-यू यूनिट लेकर चले गए. कैमरामैन के बच्चे की तबीयत ठीक नहीं रहती थी, उन्हें नियमित अंतराल पर अस्पताल में अपने बच्चे का इलाज कराना होता था. जब उन्हें सैलरी नहीं मिली और कंपनी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो वह कमैरा और लाइव-यू यूनिट लेकर बिहार चले गए.
हालांकि इंडिया अहेड के प्रेसिडेंट सुदीप मुखिया कहते हैं, “यह कोई छुपी बात नहीं है कि इंडिया अहेड में कर्मचारियों की सैलरी नहीं मिल रही है. हम कोशिश कर रहे हैं कि जल्द से जल्द सभी को पैसे दे दिए जाएं. हर दिन अलग-अलग लोगों की सैलरी दी जा रही है.”
रिकार्डेड कार्यक्रम पर भी सरकारी विज्ञापन दिखाया जाना क्या ब्रॉडकास्टिंग नियमों के खिलाफ है या इसको लेकर कोई नियम भी है? इस पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के एक कर्मचारी कहते हैं, “जब तक चैनल कोई प्रोग्राम कोड का उल्लंघन नहीं कर रहा तब तक कुछ गलत नहीं है. मंत्रालय को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की कौन सा विज्ञापन मिल रहा है.”
सबसे खास बात यह है कि करीब 17 महीनों बाद जब बार्क द्वारा मार्च 2022 में टीआरपी का आकंड़ा जारी किया गया था. उसमें अंग्रेजी चैनलों की लिस्ट में 9वां नंबर इंडिया अहेड का था. जिसका मार्केट शेयर 0.9 प्रतिशत बताया गया था. उस समय रिपब्लिक टीवी टीआरपी के मामले में 35.3 प्रतिशत मार्केट शेयर के साथ नंबर वन था.
यूरो न्यूज़ डील का झांसा
जून-जुलाई के महीने में जब कंपनी सैलरी नहीं दे पा रही थी. तब सीनियर मैनेजमेंट के लोगों ने यूरो न्यूज़ से डील होने के नाम पर कर्मचारियों को कंपनी छोड़ने से रोका. इन्वेस्टर्स के आने को लेकर अक्टूबर महीने में कंपनी ने सभी कर्मचारियों को ऑफिस बुलाया. कंपनी में निवेश करवाने के लिए मैनेजमेंट दिखाना चाहता था कि यहां काफी कर्मचारी काम करते हैं.
यूरो न्यूज़, भारत में चैनल खोलना चाहता था. उसके लिए उसे भारत में एक ऐसा चैनल चाहिए था जिसके पास लाइसेंस हो और वह पहले से ही चल रहा हो. ऐसे में ‘इंडिया अहेड’ उनके लिए मुफीद चैनल था.
एफडीआई नियमों के तहत कोई भी विदेशी कंपनी भारत में न्यूज़ चैनल का स्वामित्व नहीं रख सकती है. ऐसे में यूरो न्यूज़, इंडिया अहेड के साथ हिस्सेदारी में चैनल खोलना चाह रहा था. यूरो न्यूज़ के लिए भारत में गुरूग्राम स्थित एरॉन कैपिटल ने मध्यस्थता की.
एरॉन कैपिटल की भारत में सहयोगी जय सिन्हा के साथ भूपेन चौबे और अन्य सीनियर कर्मचारियों की बैठक भी हुई. जिसके बाद अक्टूबर महीने में एरॉन कैपिटल के चैयरमैन डेविड वोल्फी और मैनेजिंग एडिटर एमली वोल्फी भारत आए और इंडिया अहेड चैनल के दफ्तर भी गए.
इस समय तक कंपनी मैनेजमेंट को उम्मीद थी कि डील होने के बाद पैसा आ जाएगा. इसलिए वह कर्मचारियों को दिलासा दे रहे थे कि कुछ महीनों में सब ठीक हो जाएगा. डील होती इससे पहले एरॉन कैपिटल और इंडिया अहेड के शीर्ष अधिकारियों के बीच बातचीत बिगड़ गई.
इस डील से जुड़े एक कर्मचारी बताते हैं कि जब यूरो न्यूज़ वालों को कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिलने और कंपनी की स्थिति का पता चला तो यह डील रूक गई. इंडिया अहेड के अधिकारियों ने बहुत कोशिश की लेकिन यह डील फिर सिरे नहीं चढ़ पाई.
न्यूज़लॉन्ड्री ने एरॉन कैपिटल के भारत में सहयोगी जय सिन्हा से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि वह इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहते.
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