सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इससे निपटने के लिए एक एकीकृत नीति तैयार
अरविंद पांडेय, नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थान अब छात्रों की पढ़ाई के साथ ही उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी परखेंगे। यदि किसी छात्र की मानसिक स्थिति ठीक नहीं दिखी तो तुरंत इसे संस्थान में स्थापित मानसिक स्वास्थ्य व कल्याण केंद्र में भेंजेंगे, जहां प्रोफेशनल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उसकी जांच करेंगे। साथ ही जरूरत पड़ने पर उसे समुचित उपचार भी मुहैया कराएंगे।
इस बीच देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों से अपने परिसर में एक मानसिक स्वास्थ्य व कल्याण केंद्र स्थापित करने के लिए कहा गया है। उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं व तेजी से सामने आ रहे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इससे निपटने के लिए एक एकीकृत नीति तैयार की है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को तैनात करने के निर्देश
इसे पिछले दिनों यूजीसी बोर्ड ने भी मंजूरी दी है। इस नीति के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थानों को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर में मानसिक स्वास्थ्य व कल्याण केंद्र के लिए भी एक जगह सृजित करने के लिए कहा है। साथ ही इनमें प्रशिक्षण मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को तैनात करने के निर्देश दिए है। वहीं छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रखने के लिए प्रत्येक पांच सौ छात्रों पर एक वरिष्ठ शिक्षक को बतौर मेंटर व छात्रों के बीच से प्रत्येक सौ छात्रों पर एक सहायक छात्र की तैनाती देने को कहा है।
यूजीसी ने इसके साथ ही प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थानों से छात्रों की मदद के लिए एक हेल्पलाइन नंबर भी स्थापित करने को कहा है। जहां छात्रों को 24 घंटे कभी भी मदद ले सकें। इस नीति में यूजीसी ने आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए प्रत्येक संस्थानों से एक कार्ययोजना भी बनाने को कहा है। जिसमें मानसिक रूप से अवसाद में दिखने पर या उससे ग्रसित होने की सूचना पर तुरंत प्रभावी तरीके से काम किया जा सके।
इसके लिए संस्थानों के कर्मचारियों, शिक्षकों और छात्रों को प्रशिक्षित करने के भी सुझाव दिए है। ताकि खतरे को भांपते हुए तुरंत जरूरी कदम उठाए जा सके। यूजीसी ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के साथ नीति को साझा करते हुए तुरंत इसके अमल व उससे जुड़े सुझाव देने को कहा है।
इसलिए ऐसे कदम उठाने की पड़ी जरूरत
यूजीसी को छात्रों की आत्महत्या को रोकने के लिए यह नीति तब लानी पड़ी है, जब एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में मौजूदा समय में प्रत्येक दस व्यक्ति में एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य की समस्या से जूझ रहा है। यानी देश की कुल आबादी का करीब 10.6 प्रतिशत लोग मानसिक स्वास्थ्य से पीड़ित है।
इनमें से 18 से 29 आयुवर्ग के 7.3 प्रतिशत युवा गंभीर मानसिक स्वास्थ्य की समस्या से घिरे हुए है। वहीं एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में कुल होने वाली आत्महत्याओं में करीब 7.6 प्रतिशत मामले छात्रों के है।
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