राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर ऐसे संकेत दिए हैं, जिसने यूरोप समेत पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल बढ़ाने के केंद्र में आ गया है। वेनेजुएला में हस्तक्षेप और ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख के बाद अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर ऐसे संकेत दिए हैं, जिसने यूरोप समेत पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है।
ट्रंप ने साफ तौर पर कहा है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका का अधिकार होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वेनेजुएला को लेकर अमेरिकी कार्रवाइयों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी चर्चा अभी थमी भी नहीं थी।
जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ तेजी से पिघल रही
ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्तशासी क्षेत्र है और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप भी। इसका क्षेत्रफल भारत के लगभग 70 प्रतिशत के बराबर बताया जाता है। यहां तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार होने की संभावना है। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे इन संसाधनों के दोहन की संभावनाएं बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक यही कारण है कि ग्रीनलैंड अब महाशक्तियों के लिए रणनीतिक लक्ष्य बनता जा रहा है।
यूरोपीय देश अपने सैनिकों को ग्रीनलैंड भेजेंगे
ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड पर रूस और चीन की नजर है, इसलिए अमेरिका को पहले से कदम उठाना चाहिए। इसी बीच खबर है कि नाटो में शामिल कुछ यूरोपीय देशों ने अपने सैनिकों को ग्रीनलैंड भेजने की तैयारी शुरू कर दी है। डेनमार्क के नेताओं ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा नहीं बनने देंगे। हालांकि ट्रंप ने डेनमार्क की ऐतिहासिक दावेदारी पर तंज कसते हुए कहा कि सिर्फ पांच सौ साल पहले किसी नौका के वहां पहुंचने से वह क्षेत्र किसी का नहीं हो जाता।
क्या है अमेरिका-ग्रीनलैंड 1951 समझौता?
इतिहास में अमेरिका ने पहले भी ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। हां, 1951 में एक समझौते के तहत अमेरिका ने वहां सैन्य अड्डा जरूर बनाया था, जो आज भी मौजूद है। अब ट्रंप जिस तरह “कब्जे” जैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे यूरोप में असहजता बढ़ रही है।
क्यों इतना कीमती है ग्रीनलैंड?
- दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप
- भारत के लगभग 70% जितना क्षेत्रफल
- तेल-गैस और दुर्लभ खनिजों का बड़ा खजाना
- बर्फ पिघलने से संसाधन निकालना आसान
आर्थिक संकट और अंदरूनी असंतोष
दूसरी ओर ट्रंप का ईरान को लेकर रुख भी लगातार सख्त बना हुआ है। अमेरिका ईरान पर परमाणु हथियार विकसित करने के आरोप में पहले से प्रतिबंध लगाए हुए है। इसके चलते ईरान आर्थिक संकट और अंदरूनी असंतोष से जूझ रहा है। ट्रंप खुले तौर पर ईरानी जनता को विरोध जारी रखने की बात कह रहे हैं, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि अमेरिका वहां भी अस्थिरता का फायदा उठाने की रणनीति पर चल सकता है।
दुनिया में एक बार फिर अस्थिरता
ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी है कि जो देश ईरान से व्यापार करेंगे, उन पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। चीन, रूस, यूएई और भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता का विषय बन सकता है। कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड से लेकर ईरान तक ट्रंप के संकेत दुनिया में एक बार फिर अस्थिरता की आशंका बढ़ा रहे हैं, जहां संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं भी प्रभावी भूमिका निभाने में कमजोर दिख रही हैं।
इसी विषय पर जागरण प्रकाशन समूह के प्रधान संपादक श्री संजय गुप्त का आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें |
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