बदहाल हालत में कुएं
जागरण संवाददाता, पीलीभीत। कभी ग्रामीण जनजीवन की जीवनरेखा और हमारी प्राचीन सभ्यता के अटूट हिस्सा रहे कुएं आज आधुनिकता की दौड़ में गुम होते जा रहे हैं। जिले में पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व रखने वाले इन जलस्रोतों का अस्तित्व अब केवल कागजों या रस्मों तक सिमट गया है।
विडंबना यह है कि जो कुएं कभी स्वच्छ जल का पर्याय हुआ करते थे, वे आज कूड़ेदान बनकर अपनी पहचान खो रहे हैं। जिले का इतिहास प्राचीन और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है, इसमें कुएं संस्कृति का अहम हिस्सा रहे हैं। 1950-60 के दशक तक गांवों में कुएं ही पानी का मुख्य स्रोत थे, इनका उपयोग पीने और सिंचाई, दोनों कार्यों के लिए किया जाता था।
पिछले चार दशकों में बढ़ती अनदेखी के कारण इनकी दशा दयनीय हो गई है। रख-रखाव के अभाव में कई जगहों पर कुओं को पाट दिया गया है, तो कहीं ये गंदगी से लबालब भरे हुए हैं। आज के आधुनिक दौर में जल के विभिन्न विकल्प उपलब्ध होने के कारण कुओं के पानी का उपयोग लगभग समाप्त हो गया है।
अब इनका महत्व केवल जन्म और विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर होने वाले कुआं पूजन की परंपरा तक ही सीमित है। देहात क्षेत्रों में आज भी दर्जनों ऐसे कुएं मौजूद हैं जिनमें पानी तो है, लेकिन उनकी स्वच्छता पर किसी का ध्यान नहीं है। कुओं के सूखने और लुप्त होने के पीछे पर्यावरण में हो रहे अवांछित बदलाव भी एक बड़ा कारण हैं।
गिरते भूजल स्तर ने कुओं के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। ग्रामीण इलाकों में पुराने कुओं का जलस्तर या तो पूरी तरह समाप्त हो चुका है या फिर समाप्ति की कगार पर है।
सामाजिक कार्यकर्ता शिवम कश्यप ने बताया कि कुएं हमारी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के परिचायक है, जल के मुख्य स्तोत्र भी है इनका पतन होना कही न कही हमारे जीवन में नुकसान देय साबित होगा। इसको लेकर मैने राष्ट्रीय हरित अधिकरण से इनके उत्थान हेतु प्रयास किए जाने की मांग की उत्तर प्रदेश सरकार को अमृत सरोवर की तरह कुओं पर काम करना चाहिए।
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