सन्त समीर-
‘धुरन्धर’ देख ली। संयोग ही है कि कुछ फ़िल्मवालों ने ही परसों के दिन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में एक-दो मुद्दों पर बातचीत के लिए बुलाया था और लौटते में आने-जाने का ख़र्चा दे दिया, तो सोचा कि फ़िल्मवालों के दिए पैसे से क्यों न फ़िल्म ही देख ली जाए।

ख़ैर, ‘धुरन्धर’ अच्छी है या बुरी, इस बारे में ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा, क्योंकि फ़िल्में देखने-न-देखने के मामले में मेरी रुचि थोड़ी अलग क़िस्म की है। हाँ, इतना अवश्य कहूँगा कि यदि आपकी रुचि सिनेमा विधा में है या आप सच को बिना आवरण देखना-समझना चाहते हैं, तो यह फ़िल्म आपको एक नहीं, दो बार भी देखनी पड़ सकती है। पहली बार में आप पर्दे पर उलटते-पलटते दृश्यों और इतिहास की घटनाओं को चुनने-तरतीब से लगाने का काम कर पाएँगे और दूसरी बार में एहसास के तल पर उतारने और सच को कुछ गहराई से महसूस करने के लिए अपने-आपको साध पाएँगे।
जो लोग फ़िल्म का विरोध कर रहे हैं, तो उसकी वजह यह नहीं लगती कि उन्हें साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ने की सचमुच चिन्ता है। इस विरोध के पीछे मुझे जो कारण समझ में आ रहा है, वह यह है कि साम्प्रदायिक सद्भाव का राग अलाप-अलाप कर पीठ पीछे समाज तोड़ने का आज़ादी के बाद से ही चलता चला आ रहा एजेण्डा ऐसी फ़िल्मों से बेनक़ाब होने का डर है।
अजब है कि फ़िल्म में पाकिस्तान का सच है, पर पाकिस्तान के ही तमाम लोग कह रहे हैं कि इसमें ज़बरदस्त सच्चाई है; हाँ, जैसे फ़्लाई ओवर या कुछ इमारतें वग़ैरह इसमें दिखा दिए गए हैं, वैसा विकास ज़रूर पाकिस्तान में अभी नहीं है।
समय ज़्यादा नहीं है, इसलिए लम्बी बातें नहीं करूँगा, पर फ़िल्म विरोधियों का एजेण्डा, एक सच से मेरे सामने और स्पष्ट हो गया है। एक मित्र ने किन्हीं पत्रकार आरफ़ा ख़ानम की बात मुझे सुनाई और मेरी राय पूछी। पता चला कि ये मोहतरमा काफ़ी नाम कमा चुकी हैं; मेरा ही दुर्भाग्य है कि मैं अब तक इन्हें नहीं जानता था। ‘आरफ़ा’ शब्द का एक अर्थ ‘ब्रह्मज्ञानी’ या ‘सब कुछ जानने-पहचानने वाली’ भी होता है, तो ये मोहतरमा ‘यथा नाम तथा गुण’ वाली आप्तवचन शैली में फ़तवे देती हुई लगती हैं। उनके दस-बीस वाक्य सुनते ही मैंने यों ही कहा कि ये अल-तक़ियाह की ‘टिपिकल’ उदाहरण लग रही हैं।
मेरे मित्र ने पूछा कि अल-तक़ियाह क्या है। मैंने उन्हें समझाया कि क़ुरान का आधार लेकर पाकिस्तानी मदरसों में सिखाया जाता है कि जब तक तुम्हारी शक्ति कम हो, जब तक तुम काफ़िरों के हिसाब से उनको लुभाने वाले व्यवहार करते रहो, लेकिन जिस दिन तुम्हारी शक्ति या संख्या बढ़ जाए, उस दिन जेहाद का ऐलान करो और काफ़िरों को जहाँ पाओ, वहीं मारो। भारत में ऐसा कहीं-कहीं छद्म रूप में मिलेगा, पर पाकिस्तान में यह दीन की राह में एक कारगर हथियार है।
इतना सुनते ही मेरे मित्र ने कहा कि अरे यही बात तो ये आरफ़ा एक भाषण में कर रही है, मैं तो इसका मतलब ही नहीं समझ रहा था। मित्र ने मुझे एक मेडिकल कॉलेज में हो रहे इन मोहतरमा के भाषण के एक वीडियो का लिङ्क भेजा। कमाल…सचमुच यह महिला मुसलमान श्रोताओं को यही समझा रही है कि अभी हमारी ताक़त कम है तो कैसे हमें अपना तरीक़ा बदल कर काम करना होगा।
बात यह है कि हम सबकी प्यारी फ़िल्म ‘शोले’ के ज़माने से ही एक अजब एजेण्डा चलाया जा रहा है। किसी भी सम्प्रदाय या समूह का व्यक्ति हो, अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा दिखाया ही जाना चाहिए, लेकिन यह क्या बात हुई कि किसी मुसलमान किरदार को पाँच बार का नमाजी दिखाते हुए उसे शान्ति का मसीहा दिखाइए और इसके विपरीत एक पण्डित-पुजारी टाइप का किरदार गढ़कर उसे चरित्रहीन और खलनायक जैसा पेश कीजिए। परदे पर ही सही, पर बार-बार दिखे तो जीवन में भी यह सब सच लगने लगता है, जबकि सच ऐसा है नहीं। विचारधारा का बीमार एजेण्डा ऐसा है कि सच से प्रेरित ‘चक दे इण्डिया’ में वास्तविक मीर रञ्जन नेगी तक को मुसलमान दिखा दिया जाता है। नाम मुझे भूल रहा हो, तो कृपया ठीक कर लें।
ख़ैर छोड़िए, अब नक़ली बुद्धिजीविता का आतङ्क कमज़ोर पड़ रहा है, तो जनसामान्य में भी सच को बिना आवरण देखने-समझने का साहस पैदा हो रहा है। मेरा स्पष्ट मानना है कि असली साम्प्रदायिक सद्भाव का रास्ता सच के रास्ते होकर ही निकल सकता है।
जो भी हो, जिन्हें फ़िल्म देखनी हो, देखें…क्या परेशानी? सिनेमाहॉल में बैठने के बाद साढ़े तीन घण्टे से कुछ अधिक की लम्बाई परेशान नहीं करेगी। शुरू में हल्की-सी उलझन हो सकती है, पर बाद में फ़िल्म की रफ़्तार ऐसी है कि समय आपके ध्यान में रहेगा ही नहीं। गालियाँ हैं, मारकाट भी है, पर असल सच से बहुत कम। दृश्यों में अश्लीलता नहीं है, पर मैं बाल-बच्चों के साथ देखना पसन्द नहीं करूँगा।
मेरी विशेष रुचि सिनेमाई परिदृश्य पर चर्चा की है, पर इसके लिए लम्बी बात करनी पड़ेगी।
बहरहाल, इतना मानना पड़ेगा कि आदित्य धर ने कला पक्ष या सिनेमा की प्रचलित शब्दावली में कहें तो ‘क्राफ़्ट’ को थोड़े अलग ढंग से परिभाषित किया है। इसके दूसरे भाग में यदि वे आतंकवाद के पीछे की मानसिकता और विचारधारा पर उँगली रख पाएँ, तो बड़ी बात होगी। और तब, एजेण्डाधारियों का लगभग पूरा ही पर्दाफ़ाश हो जाएगा, लेकिन आदित्य धर ऐसा कर पाएँगे, इसमें मुझे शक है; क्योंकि अभी तक किसी भी फ़िल्म ने आतंकवाद के कारणों की गहराई और मूल को छुआ ही नहीं है या शायद उन्हें इसका अभी तक पता ही नहीं है।
राहुल बिंद-
धुरंधर – समीक्षा (★★★☆☆)

कल धुरंधर देखी। सारी देशभक्ति, जोश, स्टार-वैल्यू और हाइप को पूरी तरह अलग रखकर, सिर्फ़ फ़िल्मी पैमानों पर बात करता हूँ। नतीजा: अपने ही तय किए हुए ऊँचे मानदंडों पर यह फ़िल्म पूरी तरह खरी नहीं उतरती। तीन सितारे उचित लगते हैं।
ताकतें:
कमियाँ:
निष्कर्ष: धुरंधर एक उच्च बजट, अच्छी तरह बनी स्पाई थ्रिलर है जो बड़े पर्दे पर एक बार देखी जा सकती है, ख़ासकर रणवीर सिंह और अक्षय खन्ना के प्रदर्शन के लिए। लेकिन जिस सटीकता, नवीनता और भावनात्मक पकड़ की उम्मीद अदित्य धर के नाम और ट्रेलर की हाइप से थी, उस स्तर तक फ़िल्म नहीं पहुँच पाती।
मेरा रेटिंग: 3/5जितना ट्रेलर ने वादा किया था, फ़िल्म ठीक उतना ही देती है—न उससे कम, न उससे ज़्यादा।
अनुराग शर्मा-
धुरंधर फ़िल्म नहीं है, मुकम्मल राजनीतिक बयान है। हिन्दी फ़िल्मों के पुराने गानों और शानदार संगीत की चाशनी में लपेटा हुआ राजनीतिक बयान। धुरंधर में हिंसा और तगड़ी कहानी का एक विस्फोटक मिश्रण है जो दिखाता है कि आदित्य धर ने ‘उरी’ के बाद मसाले में लपेट कर राजनीतिक संदेश देने का फ़ॉर्मूले क्रैक कर लिया है। 20 उधर हैं, तो 80 इधर।
फ़िल्म की कहानी बड़ी सरल है: भारत की खुफिया एजेंसियाँ राजनीतिक नेतृत्व और अफ़सरशाही से मदद न पाने की हालत में एक जासूस को पाकिस्तान भेजती हैं जो पाकिस्तान के आतंकी ढांचे को अंदर से खोखला करता है। बैकग्राउंड में विमान अपहरण और मुंबई हमला भी है।
यही वजह है कि धुरंधर देखने पर आपको अंदर से एक सुकून, संतुष्टि मिलती है जो 90 और 2000 के दशक में पैदा और बढ़े हुए लोग महसूस कर सकते हैं।
फ़िल्म बहुत रिसर्च के बाद बनाई गई है और इसकी झलक हर सीन में है। सिनेमा का एक उद्देश्य दर्शकों को शिक्षित करना भी है और धुरंधर इसमें सफल होती है। न सिर्फ़ भारत के दर्शकों की समझ आईएसआई, पाकिस्तानी आतंकी ढांचे, पाकिस्तानी अंडरवर्ल्ड और बलूचिस्तान के बारे में बढ़ेगी, आस्तीन के साँपों को पहचानने की आदत भी बढ़ेगी।
अक्षय खन्ना के अभिनय की बहुत तारीफ़ हुई है जो बहुत जायज़ है। एकदम ठंडे, क्रूर, लेकिन करिश्माई। रणवीर सिंह, राकेश बेदी, अर्जुन रामपाल, आर माधवन, और सारा अर्जुन ने भी अपने-अपने किरदारों में बहुत मेहनत की है। रणवीर सिंह की आँखें एक भारतीय की बेबसी बख़ूबी दिखाती हैं। सारा उन खानदानी अभिनेत्रियों से तो बेहतर ही लगती हैं जो अपने चेहरे की एक माँसपेशी तक से मेहनत नहीं करवातीं।
इस फ़िल्म में 70 और 80 के दशक के देसी और विदेशी संगीत को आधुनिक टच देकर इस्तेमाल किया गया है। आदित्य धर कहानी को आगे बढ़ाने में गानों की मदद लेते हैं और आप बोर नहीं होते। उससे भी अच्छी बात है फ़िल्म के संगीत में बहुत सारी नई प्रतिभाओं को मौका मिलना। उम्मीद है कि रेबल और शाश्वत सचदेव जैसे युवा आगे चलकर बड़ा नाम कमाने वाले हैं।
इस फ़िल्म में हिंसा है और हिंसा बहुत ज़रूरी थी। जो लोग कह रहे हैं कि इतनी हिंसा नहीं होनी चाहिए उनसे सवाल है कि आप दर्शक को असली दुनिया में होने वाली हिंसा से क्यों महरूम रखना चाहते हैं? क्या आपको लगता है कि आईएसआई किसी भारतीय एजेंट को ससम्मान विदा करेगी? हाँ, यह उन फ़िल्मों से हटकर है जिनमें पाकिस्तान को आतंकवाद का पीड़ित दिखाया जाता है।
फ़िल्म की कमज़ोरी है डायलॉग। संवाद बेहतर – तीखे और करारे – हो सकते थे, लेकिन यह कमज़ोरी फ़िल्म को पूरी तरह कमज़ोर नहीं करती।
आशा है कि इसे मार्च में आने वाले दूसरे हिस्से में दुरुस्त कर लिया जाएगा।
और रही बात पाकिस्तान और उसके प्रोपगेंडा के शिकार लोगों की निराशा की। उन्हें तो ख़ुश होना चाहिए कि किसी ने तो उनके इतने बड़े उद्योग को अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाने के लिए फ़िल्म बनाई।
सौरभ शर्मा-
मैंने धुरंधर देखी. आदित्य धर को फिल्ममेकिंग आती है. उन्हें पता है कि दर्शकों को स्क्रीन से बांधकर कैसे रखना है. उन्हें बॉलीवुड के सारे मसालों का उचित मात्रा में इस्तेमाल करना आता है. वो एक काबिल डायरेक्टर और पारखी प्रोड्यूसर हैं. अपनी ऑडियंस को पढ़ लेते हैं. जनता का दिमाग कह रहा है कि घुसकर मारना है. वो इस सेंटीमेंट के इर्द गिर्द कहानी बुन देते हैं. सारे इंग्रेडियेंट्स का सही इस्तेमाल करके चकाचक फिल्म बना देते हैं.
मसाला फिल्में ऐसे ही बनती हैं.
आप फ्रिंज को मेनस्ट्रीम में आने से कब तक रोकिएगा. याद कीजिए हम ट्रोल को फ्रिंज कहकर नकारते रहे और एक दिन ट्रोल्स ही मेनस्ट्रीम हो गए. सोशल मीडिया, मीडिया कुछ भी इससे अछूता नही रहा. लेकिन आपको लगता है कि फिल्मों को इससे बचाकर रखा जा सकता है.
फिल्में किसी दूसरे ग्रह पर नहीं बन रही हैं. प्रोड्यूसर पैसा कमाना चाहता है. वो दांव नहीं लगाएगा तो ऑडियंस कश्मीर फाइल्स, केरला स्टोरी और छावा देख आएगी. मीडियोकर फिल्मों को सुपरहिट करा देगी. सुपरहिट होने की इस ललक को आप कैसे सीमित करेंगे?
फिल्ममेकर पर कैसे पाबंदी लगाएंगे? पाबंदी जहां लगानी है वहां आपका बस नहीं चल रहा है. फिल्मों के कंधे पर इतनी भारी जिम्मेदारी मत डालिए. फिल्में ऐसे ही बनेंगी. ‘होमबाउंड’ जैसी फिल्में भी बन रही हैं, बनती रहेंगी. उनकी बात करने में वक्त लगाइए. सबके लिए सबकुछ तय करने में मत लग जाइए.
अजीत वडरनेकर-
धुरन्धर_कथा-1 : रेगिस्तान का ‘फ़ासला’ – बहरीनी ‘फ़स्ला’ तक
धुरन्धर की धमक और रहस्यमय गीत
▪इन दिनों चर्चाओं के बाज़ार में फिल्म ‘धुरन्धर’ का नाम सबसे ऊपर है। जासूसी, एक्शन और देशभक्ति के ताने-बाने में बुनी इस फिल्म में कराची के अंडरवर्ल्ड और भारतीय एजेंट हमजा के गुप्त मिशन को दिखाया गया है। लेकिन इस बार चर्चा का केंद्र केवल बारूद और साज़िशें नहीं हैं, बल्कि एक गीत है जिसने दर्शकों और श्रोताओं को एक अजीब से सम्मोहन में बाँध रखा है। यह गीत है- ‘FA9LA’ (फ़स्ला)। बहरीनी हिप-हॉप की दुनिया से निकलकर भारतीय सिनेमा में गूँजने वाला यह गीत, फिल्म के प्रतिनायक और बलूच गैंगस्टर रहमान डकैत की रूह को बयां करता है। दर्शक थिरक रहे हैं, लेकिन शब्द के अर्थ से अनजान हैं।
रहमान और उसकी रूह का आईना
▪अक्षय खन्ना द्वारा अभिनीत रहमान डकैत का किरदार फिल्म की जान है। पर्दे पर जब यह गीत बजता है, तो रहमान की बेपरवाह चाल, उसकी देह-भंगिमा और आँखों में तैरता हुआ एक अजीब-सा सूनापन दर्शकों को चौंका देता है। सोशल मीडिया और फिल्म समीक्षकों के बीच ‘FA9LA’ गीत और उस पर अक्षय खन्ना के अभिनय की जमकर तारीफ हो रही है। बहुत कम लोगों को यह आभास होगा कि जिस ‘FA9LA’ शब्द पर आज युवा थिरक रहे हैं, उसका सीधा संबंध रोजमर्रा की हिन्दी और उर्दू से है। यह वही शब्द-परंपरा है जिससे ‘फ़सल’, ‘फ़ासला’, तफ़सील, मुफ़स्सल, ‘फ़ैसला’, फैसल जैसे शब्द निकले हैं।
‘9’ का तिलिस्म: साद, ‘S’ और ‘स’ का संगम
▪सबसे पहले बात करते हैं इस गीत के अजीबोगरीब शीर्षक की, जिसे अंग्रेजी में ‘FA9LA’ लिखा जा रहा है। पहली नज़र में यह किसी कोड जैसा लगता है- ‘फा-नाइन-ला’। यहाँ अंक ‘9’ का एक विशेष ध्वनि-संकेत है। अरबी लिपि में एक अक्षर होता है- ‘साद’ (ص)। यह ‘स’ की ध्वनि देता है लेकिन इसका उच्चारण थोड़ा भारी और मूर्धन्य होता है। रोमन लिपि का ‘s’ और हिन्दी का ‘स’ लगभग एक समान हैं, और ये दोनों अरबी के साधारण ‘सीन’ (س) के लिए प्रयुक्त होते हैं। चूँकि की-बोर्ड पर उपलब्ध ‘s’ (और हमारा ‘स’) उस भारी ‘साद’ ध्वनि को व्यक्त करने में असमर्थ हैं, और अंक ‘9’ की बनावट अरबी के ‘साद’ से काफी मिलती-जुलती है, इसलिए अरब युवा चैटिंग में ‘s’ के बजाय ‘9’ को ‘साद’ के तौर पर बरतने लगे। ‘FA9LA’ की सही वर्तनी है – ‘फ़स्ला’ ( Faṣlah / فصلة )।
बहरीनी बोल: जब दिमाग का ‘कनेक्शन’ कटे
▪सवाल उठता है कि बहरीनी स्लैंग या बोलचाल में ‘फ़स्ला’ का अर्थ क्या है? बहरीनी कलाकार फ्लिपराची और डैफ़ी का यह गीत खाड़ी देशों में एक पार्टी एंथम की तरह है। यहाँ ‘फ़स्ला’ का अर्थ एक ऐसी मानसिक स्थिति से है जहाँ इंसान का दिमाग सामान्य दुनिया से ‘कट’ जाता है। जब कोई व्यक्ति अत्यधिक ऊर्जा से भरा हो, थोड़ा सनकी हो जाए, या जिसे हम अपनी भाषा में कहते हैं कि जिसका ‘तार हिल गया हो’, उसे वहाँ ‘फ़स्ला’ कहा जाता है। गीत के बोलों में नायक कहता है, “अना फ़स्ला” यानी “मैं फ़स्ला हूँ।” आगे वह उद्घोष करता है कि उसका मूड पल-पल बदलता है, वह दुनिया के नियमों की परवाह नहीं करता और अपनी ही धुन में मग्न है। यह एक प्रकार का ‘डिस्कनेक्ट’ है- भीड़ से, नियमों से और सामान्य व्यवहार से। काटने अलग करने से जोड़े तो फस्ला को विभाजित चरित्र के तौर पर भी समझा जा सकता है। रहमान वही है।
भीड़ से कटा हुआ एक ‘धुरन्धर’
▪यही वह बिंदु है जहाँ फिल्म का किरदार रहमान डकैत और यह गीत एकसार हो जाते हैं। रहमान डकैत भी तो एक ‘फ़स्ला’ ही है। वह समाज के बनाए कानूनों से कटा हुआ है। उसका अपना एक अलग न्याय-तंत्र है, अपनी अलग दुनिया है। अक्षय खन्ना ने अपनी अदाकारी से इस ‘अलगाव’ को बखूबी जिया है। उनकी आँखों में जो वीराना और चाल में जो बेफिक्री है, वह इसी ‘फ़स्ला’ मानसिक स्थिति का परिचायक है। फिल्म में यह गीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं बजता, बल्कि यह उस अराजकता का जश्न मनाता है जो रहमान के किरदार के भीतर उबल रही है। वह कब दोस्त बन जाए और कब दुश्मन, इसका कोई ‘फ़ैसला’ नहीं कर सकता क्योंकि उसके और सामान्य दुनिया के बीच एक गहरा ‘फ़ासला’ है।
रेगिस्तान में दबी शब्दों की जड़ें
▪अब इस विमर्श को थोड़ा गहरा करते हैं और उस गलियारे में चलते हैं जहाँ शब्दों की जड़ें मिलती हैं। हैरानी हो सकती है कि बहरीन का यह आधुनिक स्लैंग ‘फ़स्ला’ और भारतीय किसानों के जीवन का आधार ‘फ़सल’, दोनों एक ही माँ की संतानें हैं। इन सभी शब्दों का जन्म एक ही अरबी धातु से हुआ है और वह है – अरबी का फ़ा-साद-लाम ( ف – ص – ل)। फ़ा साद लाम से बनता है यानी फ-स-ल का मूल अर्थ है- काटना, अलग करना, विभाजन या दो चीज़ों के बीच में अंतर पैदा करना। सदियों पहले जब यह शब्द अरब के रेगिस्तानों में जन्मा, तो इसमें ‘अलगाव’ का भाव प्रधान था।
‘कालांश’ और खेत की ‘फ़सल’
▪इस ‘अलगाव’ या ‘काटने’ के भाव से ही खेती-किसानी का शब्द ‘फ़सल’ बना। इस मुक़ाम पर ध्यान आता है कि उपज को फ़सल क्यों कहते हैं। दरअसल, मूल रूप से अरबी में ‘फ़स्ल’ का अर्थ मौसम या समय का एक खंड होता था। एक ऋतु के बाद दूसरी ऋतु आती है, यानी समय का एक हिस्सा दूसरे से ‘कटता’ या ‘अलग’ होता है। समय के इसी निश्चित अंतराल या कालखंड को ‘फ़स्ल’ कहा गया। जैसे ‘फ़स्ले-बहार’ (वसंत का मौसम) या ‘फ़स्ले-गुल’। चूँकि खेती और उपज पूरी तरह मौसम के इस चक्र और समय की मियाद पर निर्भर थी, इसलिए धीरे-धीरे खेत की पैदावार को ही ‘फ़सल’ कहा जाने लगा। किसान की मेहनत का वह हिस्सा जो उसे एक निश्चित समय के बाद प्राप्त होता है, वह फ़सल है।
दूरी, दीवार और न्याय का ‘फ़ैसला’
▪इसी अरबी मूल (फ़ा-साद-लाम) से बना है एक और बेहद प्रचलित शब्द- ‘फ़ासला’। यहाँ भी मूल भाव ‘दूरी’ या ‘अंतर’ का ही है। दो बिंदुओं, दो स्थानों या दो घटनाओं के बीच का जो ‘अलगाव’ है, वही फ़ासला है। प्राचीन शहरों के चारों ओर जो ऊँची दीवारें बनाई जाती थीं, उन्हें ‘फ़सील’ कहा जाता था। यह दीवार शहर की आबादी को बाहरी वीराने या दुश्मनों से ‘काटती’ थी, अलग करती थी। इसी कड़ी में न्याय व्यवस्था का अहम शब्द ‘फ़ैसला’ भी आता है, जिसका शुद्ध अरबी रूप ‘फ़ैसलः’ है। जब कोई न्यायाधीश फ़ैसला सुनाता है, तो वह सत्य और असत्य को ‘अलग-अलग’ करता है और इसीलिए न्यायकर्ता फैसल भी कहते हैं। यानी, चाहे खेत की फ़सल हो, दो प्रेमियों के बीच का फ़ासला हो, शहर की फ़सील हो या अदालत का फ़ैसला- इन सबके केंद्र में ‘अलग करने’ का भाव ही प्रमुख है।
खेत की मेड़ से अंडरवर्ल्ड तक
▪वापस लौटते हैं बहरीनी गीत और फिल्म ‘धुरन्धर’ पर। सदियों का सफ़र तय करके जब यह शब्द आधुनिक दौर में पहुँचा, तो इसके अर्थ में एक रोचक विस्तार हुआ। जो शब्द पहले भौतिक दूरी (फ़ासला) या समय के विभाजन (फ़सल) के लिए इस्तेमाल होता था, वह अब मानसिक स्थिति के लिए प्रयुक्त होने लगा। बहरीनी युवाओं ने ‘अलग होने’ या किंचित भिन्न या कुछ ‘जुदा अंदाज़’ के भाव को एक नए अंदाज़ में पकड़ा। अगर कोई व्यक्ति सामान्य सोच-समझ से ‘कट’ जाए, अगर उसका दिमाग हकीकत से ‘अलग’ हो जाए, तो वह ‘फ़स्ला’ है। यही वह भाषाई सौंदर्य है जो ‘धुरन्धर’ फिल्म के गीत को खास बनाता है। एक शब्द जो कभी किसानों की उम्मीद (फ़सल) था, वह आज एक बलूच गैंगस्टर की सनक (फ़स्ला) बन गया है।
और चलते चलते
▪️अरबी में मुफ़स्सल जिसमें फ़ासले की ही बात है, दरअसल उसका मूलार्थ ग्रामीण क्षेत्र है। अखबारों में नगर संवाददाता और ग्रामीण संवाददाता होते हैं। उत्तर भारत में पुराने चलन से आज भी देहात को मोफस्सल ही कहा जाता है। कुछ बरस पहले तक ग्रामीण क्षेत्र में अखबार का नया कार्डधारी रंगरूट खुद को गर्व से मोफसिल या मुफसल कहता था। आशय पत्र प्रतिनिधि का होता था। मगर असल मतलब तो देहात ही था, जो शहर से अलग दूरस्थ खेत पहाड़ व जंगल तक पसरा होता है। जो मूलतः फारसी शब्द ही है।
धुरन्धर_कथा-2 : जो धुरी को थामे, वही बाज़ी पलटे
विशेषज्ञ या बाज़ीगर?▪️हिन्दी की तत्सम शब्दावली में ‘धुरन्धर’ एक ऐसा भारी-भरकम शब्द है जिसका प्रयोग हम अक्सर शिक्षा, खेल, साहित्य या राजनीति के दिग्गजों के लिए करते हैं। हालिया रिलीज़ फिल्म ‘धुरन्धर’ के शीर्षक ने इस शब्द को फिर से चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। इसका आशय अपने विषय के उस्ताद, पण्डित, गुणी, विशेषज्ञ या माहिर से होता है। बदलते दौर में ‘गुरु’, ‘उस्ताद’ और ‘मठाधीश’ जैसे शब्दों की साख भले ही गिर गई हो, लेकिन ‘धुरन्धर’ का वज़न आज भी कायम है। फिल्म के संदर्भ में देखें तो भारतीय एजेंट हमजा (फिल्म का नायक) ही ‘धुरन्धर’ है। वह देश की सुरक्षा के उस अदृश्य ‘अक्ष-दण्ड’ को अपने कंधों पर उठाए हुए है, जिस पर करोड़ों लोगों का भरोसा टिका है। मगर य़थार्थ और कल्पना के इस आख्यान में फिल्म मेंअनेक धुरन्धर नज़र आते हैं।
धुरी, दायित्व और दो छोर▪️‘धुरन्धर’ शब्द दो हिस्सों से बना है- धुर + धर। यहाँ ‘धुर’ का अर्थ है धुरी, धुरा या अक्ष-दण्ड (Axis)। वह मज़बूत छड़ जिसके दोनों सिरों पर चक्के कसे जाते हैं और जो पूरी गाड़ी का भार संभालती है। और ‘धर’ का अर्थ है- धारण करने वाला, उठाने वाला या वहन करने वाला। अतः शाब्दिक अर्थ में ‘धुरन्धर’ वह है जो धुरी को थामे रहे, जो मुख्य भार को अपने कंधों पर उठा ले। धुरन्धर बैलों के कंधे का जुआ भी है और पहियों का धुरा भी। यही नहीं, बोझ ढोनेवाला कोई भी प्राणी, बैल, खच्चर, गधा आदि भी धुरन्धर हैं। धुरन्धर का संदर्भ पौराणिक चरित्रों से भी है।
भँवर भी एक धुरी है लेकिन…▪️कहानी में केवल एक धुरी नहीं होती। यदि नायक एक छोर है, तो प्रतिनायक दूसरा छोर। समुद्र अगर केनवास है, तो उसमें उठने वाले भँवर अनेक धुरियाँ हैं। हर तूफान का मूल कोई न कोई चक्रवात होता है जो स्वयं अपनी धुरी पर नाचता है। वातावरण में अनगिनत चक्कर लगाते हैं। फिल्म का प्रतिनायक, बलूच गैंगस्टर रहमान डकैत, उसी विनाशकारी भँवर की धुरी है। अपराध जगत का वह ‘धुरन्धर’ है जिसके दम पर कराची का अपराध-चक्र चल रहा है। एक तरफ हमजा की ‘रक्षक’ वाली धुरी है, और दूसरी तरफ रहमान की ‘भक्षक’ वाली धुरी। फिल्म का रोमांच इन्हीं दो धुरन्धरों की टकराहट है।
‘दुम्बा’ और ‘चारे’ का खेल▪️अब आते हैं इस शब्द के सबसे दिलचस्प और कुछ हद तक खौफ़नाक पहलू पर। भाषाविज्ञान बताता है कि ‘धुर’ का संबंध ‘छोर’ या ‘सिरा’ से भी है। वैदिक संस्कृत में ‘धु’ का अर्थ लटकन या पुच्छ (पूँछ) भी होता है। यहीं से शब्द निकला- ‘दुम’ (फ़ारसी) और ‘दुम्बा’। मूल रूप से ‘दुम्बा’ एक खास प्रजाति की भेड़ है जिसकी दुम भारी और मांसल होती है। लेकिन जासूसी और गैंगवार की दुनिया में ‘दुम्बा’ बतौर चारा एक Metaphor भी है। शिकार को फँसाने के लिए डाला गया चारा। फिल्म के कथानक में अपहरण और फिरौती का जो खेल चलता है वहाँ हर अपहृत व्यक्ति एक ‘दुम्बा’ है, एक चारा है। रहमान जैसे धुरन्धर जानते हैं कि बड़ी मछली को फंसाने के लिए दुम्बा कब और कैसे इस्तेमाल करना है।
हिलने वाली दुम, फहराने वाली दुम▪️धुर से सुदूर ‘धुर’ का एक अर्थ ‘सुदूर’ या ‘परे’ भी होता है। धुरी का प्रभाव एक छोर से दूसरे छोर (सुदूर) तक होता है। जब समुद्र में लहर एक धुर (किनारे) से उठती है, तो वह सुदूर दूसरे किनारे तक पहुँचकर ही दम लेती है। एक गहरा दर्शन भी छिपा है। ‘दुम’ केवल शरीर का एक अंग भर नहीं, बल्कि मनोभावों का बैरोमीटर भी है। सामान्य और आक्रामक अवस्था में यह किसी पताका की तरह फहराती रहती है- जो जीवंतता, उल्लास, उत्साह और आवेश को प्रकट करती है।
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