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52.77 करोड़ के ट्रॉमा सेंटर का देख लो हाल! चार महीने में ही होने लगा ध्वस्त, सीलिंग गिरने से मचा हड़कंप

cy520520 9 hour(s) ago views 19
  

सेक्टर-32 स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का एडवांस ट्रॉमा सेंटर में सीलिंग गिरने से खतरा बढ़ा।



मोहित पांडे्य, चंडीगढ़। रीजन के सबसे बड़े और अत्याधुनिक बताए जा रहे सेक्टर-32 स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का एडवांस ट्रॉमा सेंटर अब मरीजों की जान के लिए भी खतरा बनता नजर आ रहा है। 52.77 करोड़ रुपये से बना यह सेंटर उद्घाटन के महज चार महीने बाद ही ध्वस्त होने लगा है।

शुक्रवार को ट्रॉमा सेंटर के अंदर सीलिंग गिरने की घटना से अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई। घटना के वक्त कोई मरीज या स्वास्थ्यकर्मी सीधे चपेट में नहीं आया। यदि यह हादसा पीक इमरजेंसी समय में होता तो जिम्मेदारी किसकी होती। यह वही ट्रॉमा सेंटर है, जिसे 8 महीने की देरी के बाद 8 अगस्त 2025 को शुरू किया गया था और जिसका उद्घाटन स्वयं प्रशासक गुलाबचंद कटारिया ने किया था।

प्रशासन ने इसे रीजन की सबसे बड़ी स्वास्थ्य उपलब्धि के रूप में पेश किया, लेकिन चार महीने में ही सीलिंग गिरने की घटना ने निर्माण गुणवत्ता, ठेकेदारी प्रणाली और तकनीकी निरीक्षण की पोल खोल दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना केवल एक तकनीकी खामी नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक लापरवाही का नतीजा है।
283 बेड और 40 वेंटिलेटर सुविधा का दावा

283 बेड और 40 वेंटिलेटर सुविधा का दावा करने वाले इस ट्रॉमा सेंटर में मरीजों की भौतिक सुरक्षा तक सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उद्घाटन से पहले किसी स्वतंत्र एजेंसी से स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट कराया गया था या नहीं। यदि कराया गया था, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई।
करोड़ों खर्च, फिर भी अधूरा ट्रॉमा सेंटर

एडवांस ट्रॉमा सेंटर को भले ही अत्याधुनिक बताया गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। सेंटर में न तो पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हैं, न ही नर्सिंग स्टाफ की पूरी व्यवस्था है। कई जरूरी ट्रॉमा सुविधाएं अब तक शुरू नहीं की जा सकीं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ कहना है कि मौजूदा ढांचा एक फुल-फ्लेज्ड ट्रॉमा सेंटर नहीं, बल्कि केवल इमरजेंसी बेड का विस्तार है, जिसे जल्दबाजी में ट्रॉमा सेंटर का नाम दे दिया गया।
मरीजों की जान पर प्रयोग?

ट्रॉमा सेंटर में सीलिंग गिरने की घटना ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या करोड़ों रुपये की लागत से बने सरकारी स्वास्थ्य प्रोजेक्ट्स में मरीजों की सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है? क्या जवाबदेही तय होगी या मामला भी अन्य सरकारी जांचों की तरह फाइलों में दब जाएगा।
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