1) बच्चों के अधिकार
हमारे यहां बच्चे को मां के गर्भ से उसे संरक्षण मिल जाता है। भ्रूण हत्या और जन्म से पहले लिंग निर्धारण पर रोक लगाने के लिए साल 1996 में पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) कानून बनाया गया था। इसके तहत जन्म से पूर्व लिंग की जांच करने और अबॉर्शन पर रोक लगाई गई। ऐसा करने वाले डॉक्टर या लैब कर्मी के लिए सजा का प्रावधान किया गया। हालांकि, महिला की जान खतरे में होने पर या उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति सही न होने पर अबॉर्शन कराया जा सकता है। इसके अलावा अगर गर्भ में पल रहा बच्चा किसी अपंगता का शिकार है तब भी अबॉर्शन कराया जा सकता है।
बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देने के उद्देश्य से 1 अप्रैल 2010 को केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून बनाया। संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत 6 से 14 साल के बच्चों की शिक्षा अनिवार्य है। इस कानून के बनने के बाद से हर बच्चा पहली से आठवीं तक मुफ्त और अनिवार्य रूप से पढ़ेगा। उन्हें अपने नजदीक के स्कूल में दाखिला लेने का अधिकार दिया गया है। इस कानून के तहत स्कूल से बच्चों का नाम कटाना अपराध माना गया है।
6) बड़ों के अधिकार
26 जुलाई 2016 को लोकसभा में बालश्रम निषेध और विनियमन संशोधन विधेयक 2016 पारित किया गया। इसके तहत 14 साल से कम उम्र के बच्चों से व्यवसायिक या औद्योगिक इकाइयों में काम करवाना संज्ञेय अपराध माना गया है। हालांकि, वे घरेलू काम कर सकते हैं। इसके अलावा 14 से 18 साल वाले बच्चों से किसी खतरनाक उद्योग में काम नहीं कराया जाना चाहिए। ऐसा करने पर 3 साल तक सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
10) बुजुर्गों के अधिकार
बच्चों के यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए साल 2012 में POCSO (Protection Of Children From Sexual Offences Act) नाम से एक विशेष कानून बनाया गया। इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के लड़के या लड़कियों के साथ होने वाले किसी भी तरह के यौन अपराधों और छेड़छाड़ के मामलों में कार्रवाई की जाती है। इस तरह की मामलों की सुनवाई स्पेशल कोर्ट में होती है। इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा का प्रावधान किया गया है।

|