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देहरादून में अपराधियों का दुस्साहस: संपत्ति, लेन-देन और प्रेम प्रसंगों से बढ़ रही है हिंसा

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सांकेतिक तस्वीर।



विजय जोशी, देहरादून। पहाड़ों की गोद में बसा, शिक्षा और सैन्य परंपराओं के लिए जाना जाने वाला दून कभी सुकून और सुरक्षा की मिसाल माना जाता था। लेकिन, अब तस्वीर बदलती दिख रही है। प्रापर्टी के विवाद, करोड़ों के लेन-देन और प्रेम प्रसंगों में उलझे रिश्ते इस हद तक पहुंच रहे हैं कि लोग हत्या जैसे जघन्य अपराध से भी नहीं चूक रहे।

दिनदहाड़े गोली चलना, भरे बाजार में हमला, सुनसान जगहों पर धारदार हथियार से गला काट देने की घटनाएं अब दून की छवि पर प्रश्न चिह्न लगा रही हैं। दून के लोगों पर शिक्षित और अनुशासित होने के तमगे पर भी संगीन अपराध की आंच पहुंच रही है।
प्रापर्टी बना रही रिश्तों को लहूलुहान

शहर के भीतर और आसपास जमीनों के बढ़ते दामों ने संपत्ति को सबसे बड़ा दांव बना दिया है। पारिवारिक संपत्तियों पर कब्जे, बंटवारे और करोड़ों के सौदों को लेकर विवाद अब कोर्ट-कचहरी से निकलकर सड़कों तक आ रहे हैं। अर्जुन शर्मा हत्याकांड में भी संपत्ति और पैसों के लेनदेन का एंगल सामने आया। मां-बेटे के बीच अदालत तक पहुंचा विवाद भी यह बताता है कि रिश्तों पर संपत्ति व पैसा हावी हो गया है।
पैसों का हिसाब और खून का जवाब

कारोबारी लेनदेन में बढ़ता तनाव भी हिंसा का कारण बन रहा है। उधारी, निवेश और साझेदारी में अविश्वास की दरारें इतनी गहरी हो रही हैं कि लोग कानून के बजाय हथियार उठा रहे हैं। अचानक आई आर्थिक प्रतिस्पर्धा और दिखावे की दौड़ ने मानसिक दबाव बढ़ाया है। जब विवाद बढ़ता है तो संवाद की जगह आक्रोश ले लेता है और वही आक्रोश प्रहार में बदल जाता है।
प्यार में पनपा गुस्सा और फिर वार

प्रेम प्रसंगों में भी हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं। रिश्तों में अविश्वास, अस्वीकृति या सामाजिक दबाव कई बार युवाओं को अंधे गुस्से की ओर धकेल देता है। चाकू, चापड़ व अन्य धारदार हथियार आसानी से उपलब्ध हैं और आवेश में लिया गया एक फैसला जिंदगी खत्म कर देता है। हाल ही में हुए गुंजन हत्याकांड में भी प्यार या पागलपन ने एक जान ले ली।
सार्वजनिक स्थान भी नहीं रहे सुरक्षित

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब अपराधी सार्वजनिक स्थानों पर वारदात करने से भी नहीं डर रहे। बाजार, सड़क, खेल मैदान के आसपास, रेस्टोरेंट के बाहर, हर जगह अपराधियों के हौसले बुलंद दिख रहे हैं। दिनदहाड़े हुई गोलीबारी और धारदार हथियार से हमले यह संकेत दे रहे हैं कि कानून का भय कमजोर पड़ता जा रहा है। पुलिस चेकिंग, सीसीटीवी और सर्विलांस के बावजूद अपराधियों का दुस्साहस कम नहीं हो रहा।
बदलता समाज, बढ़ता तनाव

मनोविज्ञानियों के अनुसार, तेजी से बदलती जीवनशैली, पारिवारिक विघटन और सामाजिक संवाद की कमी भी हिंसा को बढ़ावा दे रही है। पहले विवाद पंचायत या परिवार के बुजुर्ग सुलझा लेते थे, अब सीधे एफआइआर और फिर प्रतिशोध की राह अपनाई जा रही है। इंटरनेट मीडिया और दिखावे की संस्कृति ने भी ‘इगो क्लैश’ को बढ़ाया है। छोटी-सी बात प्रतिष्ठा का सवाल बन जाती है और परिणाम घातक हो जाता है।
हत्या की घटनाओं ने पुलिस को भी नींद से जगा दिया

देहरादून में बीते कुछ माह में हुई हत्या की घटनाओं ने शहर के वातावरण को तो खराब किया ही, पुलिस के लिए भी चुनौतियां बढ़ा दी हैं। जहां पुलिस चोरी, धोखाधड़ी, मारपीट समेत अन्य विवादों के निपटारे में व्यस्त थी, हत्या की घटनाओं ने उन्हें भी नींद से जगा दिया है।

गैस एजेंसी संचालक अर्जुन शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इससे पहले मच्छी बाजार में गुंजन नाम की युवती की भी दिनदहाड़े गला काटकर हत्या हो गई थी, जिसके बाद से ही दून में भय का माहौल है।

पुलिस रिकार्ड के अनुसार, इस वर्ष की शुरुआत से अब तक हुई अधिकांश हत्याओं के पीछे संपत्ति विवाद, लेनदेन, पारिवारिक रंजिश और पुरानी दुश्मनी जैसे कारण सामने आए हैं।

चिंताजनक बात यह है कि अपराधी अब वारदात के लिए सुनसान जगहों की बजाय भीड़भाड़ वाले इलाकों को चुन रहे हैं, जिससे साफ है कि उनमें कानून का भय कम होता दिख रहा है।

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