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हापुड़ में मार्च से शुरू होगी स्वदेशी लैब, 4 गुना सस्ता मिलेगा सीरम; आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ेगा पशुपालन

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अति हिमीकृत वीर्य उत्पादन केंद्र का निरीक्षण करते पशुपालन मंत्री धर्मपाल सिंह। फोटो: आर्काइव



ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। प्रदेश में गोवंशियों में नर-मादा के सीरम को अलग करने वाली अमेरिकी लैब पिछले दिनों टेंडर खत्म हो जाने के चलते बंद कर दी गई थी। जटिल प्रक्रिया के मानक पूरे नहीं हो पाने के कारण सरकार ने उसके टेंडर का नवीनीकरण नहीं किया था।

ऐसे में अमेरिकी लैब एबीसी ने अपना सामान समेटना आरंभ कर दिया है। उसके बाद से सीरम छंटनी की प्रक्रिया बंद पड़ी थी। वहीं, देश में बछिया-बछड़ा का सीरम अलग करने की तकनीक विकसित कर ली गई है।

अब देश की पहली स्वदेशी तकनीक से हापुड़ के बाबूगढ़ में एनडीडीबी ( नेशनल डेयरी डेवलेपमेंट बोर्ड ) अपनी लैब स्थापित करेगी। इससे उत्तर प्रदेश के पशुपालकों को बछिया का सीरम फिर से मिलने लगेगा।
स्वदेशी तकनीक से खर्च होगा चार गुना कम

स्वदेशी तकनीक से सीरम को अलग करने का व्यय भी चार गुना कम आएगा। इससे सरकार का अनुदान पर होने वाला व्यय कम हो जाएगा। इसका निर्माण कार्य मार्च से आरंभ कर दिया जाएगा।  

पशुपालक गांयों को दूध के लिए पालते हैं, लेकिन सांड-बैल आजकल अनुपयोगी हो गए हैं। हल और गाड़ी किसी में भी बैलों का उपयोग नहीं किया जाता है। ऐसे में पशुपालक नर गोवंशियों को बेसहारा छोड़ देते हैं।
विवादों में आ गया अमेरिकी कंपनी का टेंडर

सरकार ने पांच साल पहले बाबूगढ़ के अति हिमीकृत वीर्य उत्पादन केंद्र पर नर व मादा के वीर्य को अलग करने की लैब अमेरिका की मदद से लगाई थी। इस लैब का संचालन अमेरिका की कंपनी एबीएस- एनिमल ब्रीडिंग सर्विस, द्वारा किया जा रहा था।

यह लैब हर साल बछिया के पांच लाख सीरम यूनिट का उत्पादन कर रही थी। पिछले दिनों इसका टेंडर विवादों में फंस गया। दरअसल टेंडर प्रक्रिया में तीन कंपनियों का भाग लेना आवश्यक था।

जबकि यह तकनीक अमेरिका की एबीएस और एसटी जेनेटिक्स कंपनियां ही करती थीं। तीसरी कंपनी के सामने नहीं आने से सरकार ने इस लैब के टेंडर का नवीनीकरण नहीं किया। अमेरिकी कंपनी ने अपनी लैब का सामान समेट लिया है।
अब स्वदेशी तकनीक होगी और सस्ता उत्पादन

अभी तक मेल-फीमेल सीरम को छांटने वाली तकनीक अमेरिका के ही पास थी। अमेरिकी लैब द्वारा सरकार से सीरम की एक डोज का 760 रुपया वसूला जा रहा था। हालांकि पशुपालकों को यह सौ रुपये में ही दी जा रही थी।

शेष धनराशि पर सरकार का अनुदान होता था। अब मेल-फीमेल सीरम की छंटनी वाली भारतीय तकनीक तैयार हो गई है। सभी परीक्षण पर पूरी होने के बाद सरकार ने अमेरिकी तकनीक को अलविदा कह दिया है।

एनडीडीबी ने अपनी तकनीक पर आधारित लैब तैयार करने के टेंडर जारी कर दिए हैं। अब बाबूगढ़ में भारतीय तकनीक वाली लैब मार्च में स्थापित की जाएगी।
इस बार चार गुना बड़ा होगा सेटअप

अभी तक अमेरिकी तकनीक वाली लैब से पांच लाख डोज तैयार की जा रही थीं। अब भारतीय तकनीक वाली लैब हर साल 20 लाख सीरम डोज तैयार करेगी। इस पर सरकार का खर्च भी मात्र 260 रुपये आएगा।

एनडीडीबी की लैब का निर्माण मार्च से आरंभ कर दिया जाएगा। यह अप्रैल में उत्पादन आरंभ कर देगी। पिछले दिनों वरिष्ठ आइएएस और प्रमुख सचिव पशुपालन मुकेश मेश्राम ने अति हिमीकृत वीर्य अवशीतन केंद्र का निरीक्षण किया था। तब उन्होंने बहुत जल्द भारतीय तकनीक से तैयार सीरम का वितरण करने की जानकारी दी थी।  


अमेरिकी लैब की टेंडर प्रक्रिया में समस्या आ रही थीं। वहीं उनकी तकनीक काफी महंगी पड़ रही थी। ऐसे में सरकार ने टेंडर का रिन्यूवल नहीं किया है। एबीएस कंपनी ने अपना सामान समेट लिया है।

मार्च से पशुपालन के डेयरी विभाग की अपनी लैब की स्थापना आरंभ हो जाएगी। भारतीय तकनीक से सीरम को छांटना सस्ता होगा और यह अपनी स्वदेशी तकनीक होगी।

- डाॅ. संजीव कुमार- ज्वाइंट डायरेक्टर-वीर्य अवशीतन केंद्र।

एनडीडीबी स्वदेशी तकनीक है। इसके लिए कंपनी का टेंडर दो-चार दिन में फाइनल हो जाएगा। मार्च में कंपनी अपना सेट अप लगा लेगी। यह प्रदेश की एकमात्र लैब होगी। यहां से सीरम की डोज पूरे प्रदेश में सप्लाई की जाएगीं।  

- डाॅ. सागर सिंह - तकनीक प्रभारी- वीर्य अवशीतन केंद्र।


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