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रिम्स अतिक्रमण मामला: झारखंड हाई कोर्ट ने नगर निगम की याचिका खारिज की, बोले- जांच एसीबी ही करेगी

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रिम्स का फाइल फोटो।



राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में फैले अतिक्रमण और संसाधनों की कमी को लेकर कड़ा रुख अख्तियार किया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान रांची नगर निगम को बड़ा झटका देते हुए उनके अधिकारियों के खिलाफ एसीबी जांच रोकने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया।   
फ‍िलहाल नगर निगम को राहत नहीं अदालत ने स्पष्ट किया कि रिम्स परिसर से अतिक्रमण हटाने में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों को कोई रियायत नहीं दी जाएगी। रांची नगर निगम ने याचिका दाखिल कर अपने कर्मचारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं करने का आग्रह किया था।   इस पर अदालत ने कहा क‍ि एसीबी भी सरकार का ही अंग है। यदि निगम के अधिकारियों को राहत दी जाती है, तो राजस्व और बैंक जैसे अन्य पक्ष भी ऐसी ही मांग करेंगे।    कोर्ट ने निगम को निर्देश दिया कि वे अपना पक्ष सीधे एसीबी के जांच अधिकारी के समक्ष रखें। उल्लेखनीय है कि एसीबी ने कोर्ट को सूचित किया है कि मामले में प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है और संलिप्त पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ नामजद कार्रवाई की जाएगी।
रिम्स निदेशक की तय होगी जिम्मेदारी

अस्पताल की बदहाली पर नाराजगी जताते हुए हाई कोर्ट ने रिम्स प्रबंधन को अप्रैल तक सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि:

  •     जीवन रक्षक उपकरणों की खरीद जो लंबे समय से लंबित है, उसे तत्काल पूरा किया जाए।
  •     रिम्स में जितने भी पद रिक्त हैं, उन पर नियुक्ति की प्रक्रिया शीघ्र संपन्न हो।
  •     10 अक्टूबर 2025 के आदेश के अनुपालन की अद्यतन स्थिति के साथ 20 मई तक शपथ-पत्र दाखिल करें।



अदालत ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर आदेशों का पालन नहीं होता है, तो इसके लिए सीधे तौर पर रिम्स निदेशक जिम्मेदार माने जाएंगे।  
मरीजों की पीड़ा पर प्रार्थी की दलील

प्रार्थी ज्योति कुमार की ओर से अधिवक्ता दीपक दुबे ने कोर्ट को बताया कि जनहित याचिका के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस सुधार नहीं दिख रहा है। चिकित्सा उपकरणों की कमी के कारण गंभीर मरीजों, विशेषकर गरीब तबके के लोगों को इलाज में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
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