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जागरण संवाददाता, मुंगेर। मुंगेर जिले के लड़ैयाटाड़ थाना क्षेत्र के पैसरा गांव निवासी माओवादी कमांडर और सक्रिय सशस्त्र दस्ते के सदस्य सुरेश कोड़ा ने बुधवार को हथियार और कारतूस के साथ पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। सुरेश पर तीन लाख रुपये का इनाम घोषित था और वह लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना हुआ था। लगातार चलाए जा रहे दबाव और सघन तलाशी अभियान के बाद उसने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।
मुंगेर प्रक्षेत्र के डीआइजी राकेश कुमार ने बताया कि सुरेश कोड़ा पर मुंगेर, लखीसराय और जमुई जिलों में कुल 60 आपराधिक मामले दर्ज हैं। वह वर्ष 2008 से माओवादी गतिविधियों में सक्रिय था और उसकी गिरफ्तारी के लिए एसटीएफ एवं जिला पुलिस की टीमें लंबे समय से दबिश दे रही थीं। निरंतर छापेमारी और नेटवर्क के कमजोर पड़ने के बाद उसने आत्मसमर्पण का निर्णय लिया। गुरुवार को पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम में सुरेश कोड़ा ने विधिवत सरेंडर किया। इस अवसर पर मुंगेर डीआइजी, पटना एसटीएफ के डीआइजी संजय कुमार, जिलाधिकारी निखिल धनराज निप्पाणीकर और एसटीएफ की एसपी अंजली कुमार मौजूद थे। सुरेश ने सार्वजनिक रूप से हिंसा त्यागने और समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की इच्छा जताई।
मुंगेर नक्सल मुक्त जिला घोषित
एसटीएफ डीआइजी संजय कुमार ने कहा कि लगातार चल रहे अभियानों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। उन्होंने भटके युवाओं से हिंसा छोड़कर विकास की धारा से जुड़ने की अपील की। कभी माओवादी हिंसा से त्रस्त रहा मुंगेर अब पूरी तरह माओवाद मुक्त हो चुका है। जिलाधिकारी ने बताया कि जिले को नक्सल जोन से मुक्त घोषित किया जा चुका है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को सरकार की पुनर्वास नीति के तहत विभिन्न योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।
डीआइजी राकेश कुमार ने कहा कि वर्ष 2000 के बाद माओवाद जिले के लिए गंभीर समस्या बन गया था। शुरुआती दौर में 191 जवान शहीद हुए, लगभग 500 आम नागरिकों की जान गई और 267 हथियार लूटे गए। 25 वर्षों तक पुलिस के साथ आंखमिचौनी करने के बाद दबाव बढ़ने पर सुरेश कोड़ा ने हिंसा छोड़ मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।
सुरेश कोड़ा का आपराधिक इतिहास
सुरेश कोड़ा मूल रूप से धरहरा प्रखंड के पैसरा गांव का रहने वाला है और लंबे समय तक माओवादी संगठन के सशस्त्र दस्ते में सक्रिय रहा। आत्मसमर्पण के साथ ही उसके आपराधिक इतिहास से जुड़े कई सनसनीखेज मामले फिर चर्चा में आए। वर्ष 2021 में उसने अजीमगंज पंचायत के नव निर्वाचित मुखिया परमानंद टुड्डू की निर्मम हत्या की थी। चुनाव परिणाम के बाद शपथ ग्रहण से पहले उसने अपने दस्ते के साथ उन्हें घर से खींचकर मार डाला, जिससे इलाके में दहशत फैल गई और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, 2008 के बाद सुरेश कोड़ा माओवादी गतिविधियों में और अधिक सक्रिय हुआ और सशस्त्र दस्ते का प्रभावशाली चेहरा बन गया। उसके खिलाफ हत्या, रंगदारी, आर्म्स एक्ट और पुलिस पर हमले जैसे दर्जनों संगीन मामले दर्ज हैं। मुंगेर, लखीसराय और जमुई जिलों में उस पर कुल 60 केस दर्ज हैं। 2008 में उसने मुंगेर के धरहरा थानान्तर्गत कुमरपुर गांव के चौकीदार की हत्या की थी। 2018 में हवेली खड़गपुर थाना क्षेत्र में सात वाहनों में आग लगाने और आठ मजदूरों का अगवा करने का भी मामला दर्ज हुआ।
दबिश के बाद टूटा नेटवर्क
एसटीएफ और जिला पुलिस की संयुक्त टीमों ने वर्षों तक उसके ठिकानों पर दबिश दी। सघन तलाशी अभियान और खुफिया तंत्र की मजबूती के कारण उसका नेटवर्क कमजोर पड़ गया। अंततः उसने आत्मसमर्पण का रास्ता चुना। पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि हिंसा छोड़ने वालों के लिए सरकार की पुनर्वास नीति प्रभावी ढंग से लागू की जाएगी।
पुनर्वास नीति और मुख्यधारा में वापसी
प्रशासन का कहना है कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को सरकार की योजनाओं से जोड़कर समाज की मुख्यधारा में लाया जाएगा। रोजगार, कौशल विकास और स्वरोजगार योजनाओं के माध्यम से उन्हें नया जीवन शुरू करने का अवसर दिया जाएगा। अधिकारियों ने भटके युवाओं से अपील की कि वे हथियार छोड़कर विकास की धारा से जुड़ें।
माओवाद से उबरता क्षेत्र
कभी माओवाद हिंसा से जूझ रहे इस इलाके में अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। लगातार अभियानों और सामाजिक पहल के चलते दहशत का माहौल कम हुआ है। सुरेश कोड़ा का आत्मसमर्पण सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है, जिससे यह संदेश गया है कि कानून के रास्ते पर लौटने का विकल्प अब भी खुला है।
सुरेश कोड़ा पर दर्ज प्रमुख नक्सल कांड
सुरेश कोड़ा पर मुंगेर जिले के विभिन्न थानों में कुल 13 नक्सल कांड दर्ज हैं। बरहट थाना में छह मामले, सोनो और चकाई में एक-एक, खैरा में तीन, चंद्रमंडी में एक और सदर थाना में एक। इनमें 2011 के पंचायत चुनाव में लक्ष्मीपुर बूथ पर पुलिस और नागरिकों पर हमला, मोबाइल टावर जलाना, प्रखंड कार्यालय फूंकना और स्थानीय लोगों की हत्या जैसी वारदातें शामिल हैं।
सुरेश कोड़ा का आत्मसमर्पण सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे यह साबित होता है कि लंबे समय तक हिंसा में सक्रिय रहे माओवादी नेताओं के लिए भी मुख्यधारा में लौटने का विकल्प खुला है। इससे न केवल इलाके में शांति बहाल होगी, बल्कि युवा पीढ़ी को विकास और शिक्षा की दिशा में जोड़ने का संदेश भी मिलेगा।
पिछले आत्मसमर्पण की श्रृंखला
इससे पहले भी पुलिस केंद्र मलयपुर में नक्सली कमांडर अर्जुन कोड़ा, बालेश्वर कोड़ा और नारायण कोड़ा ने आत्मसमर्पण किया था। सुरेश कोड़ा का सरेंडर इस श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो मुंगेर जिले को माओवादी हिंसा से मुक्त करने की दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है। मुंगेर प्रक्षेत्र में लगातार चलाए जा रहे अभियानों और सामाजिक जागरूकता के प्रयासों का परिणाम सामने आया है। सुरेश कोड़ा जैसे उच्च स्तर के माओवादी कमांडरों का आत्मसमर्पण यह संदेश देता है कि हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की संभावना हमेशा बनी रहती है। अब जिले में नक्सल प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है और सुरक्षा तथा विकास की दिशा में नए अवसर खुल रहे हैं। |
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